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नगर निकाय सीटों पर आरक्षण का मसला तय नहीं होने से कांग्रेस को प्रत्याशियों के चयन में खासी परेशानी पेश आ रही है। खासतौर पर आठ नगर निगमों के मेयर पदों के प्रत्याशियों के चयन को लेकर प्रमुख विपक्षी पार्टी में ऊहापोह बना हुआ है। कांग्रेस को नगर निगमों के चुनाव में जिताऊ चेहरों की तलाश

निकाय चुनाव में दबदबा साबित करने के लिए लिहाज से अहम माने जा रहे मेयर पद पर पार्टी जिताऊ चेहरों पर दांव खेलने के पक्ष में है। फिलवक्त ऐसे में पूर्व मंत्रियों व पूर्व विधायकों के दावों पर ज्यादा गौर किया जा रहा है। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला आरक्षण की स्थिति साफ होने पर ही लिया जाएगा। 

विधानसभा चुनाव के बाद उपजी निराशा से उबरने को कांग्रेस पर निकाय चुनाव में बेहतर प्रदर्शन का दबाव है। इसे देखते हुए पार्टी पूरी शिद्दत से तैयारियों में जुटी है। राज्य में आठ नगर निगम, 41 नगरपालिका परिषद और 43 नगर पंचायत हैं। 

भाजपा सरकार कई ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी क्षेत्रों के दायरे में लाकर निकायों की संख्या में बड़ा इजाफा कर चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मजबूत वोट बैंक के बूते कांग्रेस की सत्तारूढ़ भाजपा की परेशानी बढ़ाने की रणनीति की परीक्षा नए नगर निगमों, नए सीमा विस्तार के बाद आकार बदल चुके पुराने नगर निगमों के साथ ही अन्य छोटे निकायों में होनी है। इसी वजह से निकायों के नए परिसीमन को लेकर कांग्रेस की ओर से आवाज बुलंद की गई। 

कांग्रेस की नजरें छह से बढ़कर आठ हो चुके नगर निगमों पर भी टिकी हैं। इन निगमों में मिलने वाली कामयाबी राज्य ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ और विपक्षी दल के मनोबल को बढ़ाने का काम करेगी। इस मनोबल के बूते ही अगले वर्ष लोकसभा चुनाव की जंग लड़ी जानी है। 

चूंकि, नगर निगमों समेत तमाम निकायों के लिए अभी आरक्षण तय नहीं हो पाया है, इस वजह से प्रत्याशियों के चयन को लेकर पार्टी में दुविधा बनी हुई है। अंदरखाने आरक्षण की संभावित स्थिति का आकलन करते हुए प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। 

माना जा रहा है कि नगर निगमों के चुनाव में सत्तारूढ़ दल को कड़ी टक्कर देने के लिए पूर्व विधायकों या पूर्व मंत्रियों पर दांव खेला जा सकता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह की मानें तो पार्टी जिताऊ प्रत्याशियों पर दांव खेलेगी।

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