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Up Kiran, Digital Desk: उत्तर प्रदेश के मदरसा शिक्षा परिषद ने हाल ही में एक अहम निर्णय लिया है, जिसमें राज्य के दो प्रमुख मदरसों की मान्यता निलंबित कर दी गई है। इन मदरसों में सबसे अधिक चर्चित मामला आजमगढ़ के मुबारकपुर स्थित मदरसा अशरफिया मिस्बाहुल उलूम का है। इस मदरसे का इतिहास 78 साल पुराना है और यह एक अनुदानित संस्थान के रूप में काम कर रहा था। अब यह विवादास्पद मदरसा वित्तीय गड़बड़ी के कारण सुर्खियों में है।

शमसुल हुदा खान पर गंभीर आरोप

मदरसा अशरफिया के सहायक शिक्षक शमसुल हुदा खान पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। बताया जा रहा है कि शमसुल हुदा, जो ब्रिटेन के नागरिक हैं और 2007 से वहीं निवास कर रहे हैं, फिर भी इस मदरसे से वेतन और अन्य भत्ते प्राप्त कर रहे थे। जांच में यह भी सामने आया कि उन्होंने 5 साल, 7 महीने और 3 दिन तक बिना किसी वैध कारण के अनुपस्थिति दर्ज की, जिसमें से 502 दिन की छुट्टी चिकित्सीय अवकाश के नाम पर स्वीकृत की गई थी।

यह संदेहास्पद मामला और भी गंभीर हो गया जब यह तथ्य सामने आया कि विदेश में रहने के बावजूद शमसुल हुदा को वेतन, पेंशन, जीपीएफ और अन्य सरकारी लाभ दिए जा रहे थे।

मदरसा परिषद का कड़ा कदम

मदरसा शिक्षा परिषद की रजिस्ट्रार अंजना सिरोही ने इस मामले पर स्पष्ट बयान दिया। उन्होंने बताया कि मदरसा प्रबंधन ने शमसुल हुदा को अवैतनिक अवकाश और चिकित्सा अवकाश की अनुमति दी, जबकि वे विदेश में रहकर काम कर रहे थे। इस गड़बड़ी को राजकोष को वित्तीय नुकसान पहुंचाने वाला संगठित अपराध माना गया।

इसके कारण, मदरसा परिषद ने मदरसा अशरफिया की मान्यता निलंबित करने का कड़ा कदम उठाया है। साथ ही, परिषद ने अन्य मदरसों में भी जांच तेज करने और वित्तीय नियमों का पालन सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाने की योजना बनाई है।

मदरसा शिक्षा प्रणाली पर असर

इस निर्णय के बाद मदरसा शिक्षा प्रणाली के बारे में कई सवाल उठने लगे हैं। क्या इस तरह की गड़बड़ियों से मदरसों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है? क्या इस तरह के मामलों से मदरसा शिक्षा में सुधार की आवश्यकता नहीं है? यह सवाल अब शिक्षा विभाग के लिए एक चुनौती बन गए हैं। ऐसे मामलों पर सख्ती से कार्यवाही करके ही शिक्षा के इस क्षेत्र को पारदर्शी और व्यवस्थित किया जा सकता है।