
Up Kiran, Digital Desk: आजकल भारत में हर तरफ़ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की धूम है। सरकार की अपनी AI मॉडल बनाने की पहल हो, नए-नए AI स्टार्टअप्स हों या फिर भविष्य की बड़ी-बड़ी योजनाएं, जोश की कोई कमी नहीं है। लेकिन इस सुनहरी तस्वीर के पीछे एक बड़ी कमज़ोरी छिपी है, जिसके बारे में विशेषज्ञ आगाह कर रहे हैं। भारत के पास बेहतरीन रिसर्च करने वाले दिमाग़ हैं और डिजिटल जानकारी रखने वाले लोगों की भी बड़ी संख्या है, पर इन दोनों को जोड़ने वाली एक अहम कड़ी ग़ायब है।
क्या है ये "Missing Middle"?
AI और तकनीक के विशेषज्ञ जसप्रीत बिंद्रा ने इस कमज़ोरी को "मिसिंग मिडिल" (Missing Middle) का नाम दिया है। आसान भाषा में कहें तो, ये वो लोग हैं जो AI की गहरी रिसर्च को समझते हैं और उसे रोज़मर्रा की चीज़ों और बिज़नेस में इस्तेमाल करना जानते हैं।
ये वो AI प्रोडक्ट मैनेजर, मशीन लर्निंग इंजीनियर, डेटा ट्रांसलेटर और एथिक्स सलाहकार हैं, जो शायद खुद AI मॉडल नहीं बनाते, लेकिन बने हुए मॉडल को असली दुनिया की ज़रूरतों के हिसाब से ढालना और उसे बड़े पैमाने पर लागू करना जानते हैं। यही वो लोग हैं जो AI को लैब से निकालकर आपकी और हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बनाते हैं।
इस 'मिडिल' के बिना क्या नुक़सान हो रहा है?
इस "मिसिंग मिडिल" की कमी का सबसे ज़्यादा असर नए स्टार्टअप्स और बड़ी कंपनियों पर पड़ रहा है। कंपनियाँ AI को अपना तो लेती हैं, लेकिन उनके पास ऐसे लोग नहीं होते जो इसे सही तरीक़े से बिज़नेस में इस्तेमाल कर सकें। नतीजा यह होता है कि बड़े-बड़े आइडिया सिर्फ़ पायलट प्रोजेक्ट तक ही सीमित रह जाते हैं और कभी ज़मीनी हक़ीक़त नहीं बन पाते। AI बस एक आकर्षक शब्द बनकर रह जाता है, जिससे निवेशकों को तो लुभाया जा सकता है, पर आम लोगों की समस्याओं को सुलझाया नहीं जा सकता।
यही वजह है कि अमेरिका और यूरोप की तुलना में भारत में AI को असलियत में अपनाने की रफ़्तार बहुत धीमी है। वहाँ रिसर्च के साथ-साथ उसे इस्तेमाल करने वाले पेशेवरों की भी बड़ी संख्या तैयार हुई, जबकि भारत ने सिर्फ़ रिसर्च और बेसिक डिजिटल शिक्षा पर ही ज़्यादा ध्यान दिया।
तो फिर इसका समाधान क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब और PhD वालों से ज़्यादा, 'जॉब-रेडी' पेशेवरों की ज़रूरत है। इसका रास्ता AI से जुड़े छोटे-छोटे प्रैक्टिकल कोर्स, सर्टिफ़िकेशन प्रोग्राम और बूटकैंप से होकर गुज़रता है। सरकार की स्किल इंडिया जैसी योजनाओं, कंपनियों की ट्रेनिंग और एड-टेक कंपनियों को मिलकर इस खाई को पाटना होगा।
भारत का AI का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि हम कितने बड़े मॉडल बनाते हैं, बल्कि इस पर निर्भर करेगा कि हम उसे कितनी अच्छी तरह अपनी तरक़्क़ी के लिए इस्तेमाल कर पाते हैं। और इस काम को अंजाम देने की ज़िम्मेदारी इसी "मिसिंग मिडिल" के कंधों पर होगी।
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