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Up kiran,Digital Desk : आजकल जब भी पाकिस्तान की बात होती है, तो लगता है कि सारी लड़ाई बस इमरान ख़ान और फौज के बीच चल रही है। लेकिन असली कहानी इससे कहीं ज़्यादा गहरी और खतरनाक है। मामला अब सिर्फ़ एक सियासी शतरंज का नहीं रहा, बल्कि यह लड़ाई अब फौज के वजूद, अलग-अलग सूबों की पहचान और देश की टूटती अर्थव्यवस्था से जुड़ गई है। पाकिस्तान इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक चिंगारी भी पूरे देश को जला सकती है।

असली डर क्या है पाकिस्तानी फौज का?

पाकिस्तानी फौज हमेशा से यह तय करती आई है कि देश की कहानी क्या होगी, विदेश नीति कौन बनाएगा और देश के अंदर किसका दबदबा रहेगा। लेकिन इमरान ख़ान को वो अब सिर्फ एक राजनीतिक चुनौती नहीं मान रही, बल्कि अपने इसी दबदबे और सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा मान रही है।

फौज की अपनी खुफिया रिपोर्ट्स में यह चिंता जताई गई है कि इतिहास में पहली बार लोग लोकतंत्र के लिए नहीं, बल्कि सीधे-सीधे फौज के खिलाफ़ खड़े हो रहे हैं। फौज ने मीडिया को कंट्रोल करने, नेताओं को तोड़ने और इमरान ख़ान के समर्थकों को डराने-धमकाने की हर कोशिश कर ली, लेकिन इसका असर उल्टा हो रहा है। लोगों का गुस्सा कम होने की बजाय और बढ़ता जा रहा है।

एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने नाम न छापने की शर्त पर जो कहा, वह सबसे खतरनाक है। उन्होंने कहा - "असली समस्या यह नहीं है कि इमरान ख़ान लोकप्रिय हैं। असली समस्या यह है कि इतिहास में पहली बार फौज की ताकत और उसका सम्मान, एक नेता की लोकप्रियता के सामने कमज़ोर महसूस हो रहा है। यह हमारे लिए सिर्फ एक सियासी सिरदर्द नहीं, बल्कि हमारे वजूद के लिए खतरा है।"

इस्लामाबाद की हुकूमत बनाम सूबों का ग़ुस्सा

  • पंजाब: फौज और पुलिस की तमाम सख्ती के बाद भी पंजाब में इमरान के लिए लोगों का समर्थन कम नहीं हुआ है।
  • खैबर पख्तूनख्वा: यहां तो फौज और केंद्र सरकार के खिलाफ गुस्सा चरम पर है। लोग अब इमरान की पार्टी को अपनी पहचान का प्रतीक मानने लगे हैं।
  • सिंध: कराची जैसे बड़े शहर इमरान के साथ खड़े हैं, हालांकि गांव के इलाके अभी भी पुरानी पार्टी (PPP) के साथ हैं।
  • बलूचिस्तान: यहां की लड़ाई तो और भी अलग है। यह इमरान बनाम फौज से ज़्यादा, बलूच पहचान बनाम इस्लामाबाद की लड़ाई है।

साफ है कि फौज की ताकत अब सिर्फ कुछ बड़े शहरों तक सिमट कर रह गई है, जबकि इमरान की लोकप्रियता पूरे देश में फैल चुकी है। यह लड़ाई अब पार्टियों की नहीं, बल्कि केंद्र में बैठी फौजी हुकूमत और देश के अलग-अलग सूबों की जनता के बीच की बन गई है।

कंगाली ने आग में घी का काम किया

पाकिस्तान का खज़ाना खाली हो चुका है। बाहर से कर्ज मिलने की कोई पक्की गारंटी नहीं है। खाने-पीने की चीजों से लेकर पेट्रोल-डीजल तक सब कुछ आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहा है। बेरोजगारी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

आम जनता अब यह मान चुकी है कि पुराने नेता और फौज, दोनों ही देश को बचाने में फेल हो चुके हैं। फौज के सामने चुनौती सिर्फ़ इमरान को रोकने की नहीं, बल्कि इस भयंकर गरीबी और गुस्से की आग को काबू करने की भी है। और दुख की बात यह है कि फौज के पास इस आर्थिक संकट को ठीक करने का कोई प्लान नहीं है, बस डंडे के ज़ोर पर लोगों को चुप कराने का तरीका है।

इसीलिए यह लड़ाई अब तीन-तरफ़ा हो चुकी है... फौज, सियासत और कंगाली। और इनमें से किसी भी एक मोर्चे पर हुई एक छोटी-सी गलती, पूरे पाकिस्तान को ऐसी आग में झोंक सकती है, जिसे बुझाना नामुमकिन हो जाएगा।