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Up Kiran, Digital Desk: क्रिष्णदेव याग्निक अपनी फिल्म ‘वश लेवल 2’ के साथ लौटे हैं। यह वही निर्देशक हैं जिनकी गुजराती फिल्म वश (2023) अचानक हिट होकर चर्चा में आ गई थी। सीक्वल से उम्मीद हमेशा बड़ी होती है—दर्शक जानना चाहते हैं कि क्या जादू दोबारा हो सकता है या पहली चमक केवल इत्तेफाक थी। इस बार भी याग्निक ने देर नहीं की, फिल्म एकदम शुरुआत से डर और अव्यवस्था में कूदती है।

बारह साल बाद की कहानी

पहली फिल्म की घटनाओं के लगभग बारह साल बाद कहानी शुरू होती है। जहां स्कूल को आमतौर पर दोस्ती और सपनों का ठिकाना माना जाता है, वहीं इस फिल्म में वही जगह डरावनी घटनाओं का गढ़ बन जाती है। 17-18 साल की स्कूली छात्राएँ हिप्नोटिज्म की शिकार बनती हैं और उनका बर्ताव किसी साइकॉ पैथिक भीड़ या ज़ॉम्बी थ्रिलर जैसा प्रतीत होता है। एक साथ छत से कूदना, राह चलते लोगों पर हमला करना—ये सब दृश्य मासूमियत को खौफ में बदल देने वाले हैं।

कैद घर से फैलती दहशत

पहली वश की ताकत उस संकुचित वातावरण में थी जहाँ एक परिवार अनदेखे आतंक का सामना करता है। एक घर की चार दीवारों में बुनी गई दहशत ने कहानी को निजी और तीखा बना दिया था। लेकिन इस बार परदे का फैलाव ज़्यादा बड़ा है। कई पात्र, कई परतें और ज़्यादा तमाशा। नतीजा उतना सटीक नहीं लग पाता। डर अब ऊँची आवाज़ में और कुछ बिखरा हुआ महसूस होता है।

जांकी बोदीवाला की खामोशी

पहली फिल्म की जान कही जाने वाली जांकी बोदीवाला, जिन्हें हाल ही में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है, इस बार बहुत पीछे खड़ी दिखती हैं। अधिकतर समय वे कोमा जैसी स्थिति में चित्रित हैं। उनका स्थिर चेहरा और जमी हुई मुस्कान चुपचाप डर पैदा करती है। उनके हिस्से बहुत कम दृश्य आए, लेकिन वही खामोशी वातावरण को और ठंडा बना देती है।

पिता की जद्दोजहद और गुरुत्व

फिल्म का भार इस बार हीतु कनोडिया उठाते हैं, जो पीड़ित पिता अथर्व का किरदार निभाते हैं। वे गुस्से और दर्द में उलझा एक ऐसा चेहरा दिखाते हैं जो अराजकता के बीच कहानी को केंद्रित रखता है। हितेन कुमार, जो हमेशा गंभीरता लाने में माहिर हैं, योजना बनाने वाले चालाक ‘मामा’ के रूप में प्रभावी हैं। मोनल गज्जर स्कूल की प्रिंसिपल की भूमिका में दिखाई देती हैं लेकिन ज़्यादातर डर और असहायता ही झलकाती रहती हैं।

झंकार और झटके, मगर कहानी कमजोर

फिल्म में कुछ संवाद पितृसत्ता पर चोट करते हैं, मगर वे आधे-अधूरे रह जाते हैं। असल जोर विजुअल शॉक और सामूहिक हिप्नोसिस के दृश्यों पर है, जिन्हें याग्निक खासकर पहले हाफ में बड़े जोश से पेश करते हैं। लेकिन जैसे ही फिल्म दूसरा हिस्सा छूती है, रफ्तार टूटने लगती है। क्लाइमैक्स अचानक समेट लिया गया लगता है और ट्विस्ट उम्मीद से कहीं हल्का पड़ जाता है।

शैतान से तुलना और निष्कर्ष

याद रहे कि पहली वश को हिंदी में शैतान नाम से रीमेक किया गया था। बॉलीवुड संस्करण चमक-दमक से भरपूर था मगर उसमें वह कच्चापन और क्रूर ईमानदारी नहीं थी जो याग्निक के विज़न में थी। वश लेवल 2 में वही तीखी भावनाएँ दोबारा दिखती हैं, हालांकि यह सफ़र कई जगह बेतरतीब भी महसूस होता है। सबसे बड़ा गुण यही है कि यह कहीं भी धोखा नहीं देती।

अंत में कहा जा सकता है कि वश लेवल 2 पहली फिल्म से ज़्यादा ऊँची आवाज़ में और ज़्यादा बिखरी हुई है। यह परफेक्ट नहीं है, लेकिन इसमें डर के कुछ ऐसे टुकड़े हैं जो क्रेडिट रोल के बाद भी दिमाग में चुभते रहते हैं।

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