पूरे देश में मनाई जा रही है बकरा ईद जानें इस घटना के ज़रिए अनेक गहरे संदेश

आज पुरे देश में क़ुरबानी का त्यौहार मनाया जा रहा हैं और इस त्योहार को बनाने के पीछे एक बहुत मशहूर कहानी है। कहानी इस तरह है कि पेग़म्बर या देवदूत इब्राहीम

आज पुरे देश में क़ुरबानी का त्यौहार मनाया जा रहा हैं और इस त्यौहार को बनाने के पीछे एक बहुत मशहूर कहानी है। कहानी इस तरह है कि पेग़म्बर या देवदूत इब्राहीम के सपने में अल्लाह मियां आए और उन्होंने इब्राहीम से अपनी सबसे ज़्यादा प्यारी चीज़ को अल्लाह के नाम पर क़ुरबान करने के लिए कहा।

festival of sacrifice

इब्राहीम के पास अपने बेटे इस्माइल से ज़्यादा प्यारी चीज़ कोई थी नहीं तो उन्होंने इस्माइल की क़ुरबानी देने का फ़ैसला किया। उन्होंने यह बात इस्माइल को बताई तो वह भी क़ुरबानी के लिए तैयार हो गया।

अब्राहीम ने बेटे इस्माइल के हाथ पांव बांधे। उसकी ऑखों पर पट्टी बांधी फिर ख़ुद अपनी आंखों पर भी पट्टी बांध ली क्योंकि वह ख़ुद भी इस दर्दनाक मंज़र को देखना नहीं चाहते थे।

तभी इस्हाक़ नाम का फ़रिश्ता वहां आया और उसने इस्माइल को हटा कर उसकी जगह एक दुम्बा यानी बकरा रख दिया। इस्हाक़ ने इब्राहीम को बताया कि अल्लाह तुम्हारे क़ुरबानी के जज़्बे से बहुत ख़ुश हैं। तुम अल्लाह की परीक्षा में कामयाब रहे हो इसिलिए अल्लाह ने इस्माइल की जान बख़्श दी और क़ुरबानी के लिए दुम्बा भेज दिया।

इसी घटना की याद में साल में एक बार दुनिया भर के मुसलमान हज के लिए मक्का-मदीना जाते हैं। इस अवसर पर भी क़ुरबानी हज की एक महत्वपूर्ण रस्म मानी जाती है।जो सबको अदा करनी होती है।

ऊपरी तौर पर तो बकरा ईद महज एक बकरे की क़ुरबानी है लेकिन सच्चाई यह है कि इस एक घटना के ज़रिए अनेक गहरे संदेश दिए गए हैं।

आज्ञाकारिता

इस घटना में सबसे बड़ा संदेश आज्ञकारिता है। इब्राहीम अल्लाह की आज्ञा मानने के लिए इसलिए तैयार हो गए क्योंकि उन्हें अल्लाह पर पूरा भरासा था। इस्माइल भी अपने पिता कि बात मानने के लिए तैयार हो गए कि उन्हें भी अपने पिता पर पूरा भरोसा था। मतलब यह हुआ कि माता-पिता या घर के बुज़ुर्गों से बड़ा शुभचिंतक कोई होता नहीं है। हर माता-पिता या बुज़ुर्ग बच्चों की भलाई चाहते हैं।इसलिए भलाई इसी में की बड़ों की आज्ञा का पालन करने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए।

क़ुरबानी

यहां क़ुरबानी बेशक बकरे की दी गई है लेकिन क़ुरबानी सिर्फ़ बकरे तक सीमित नहीं है। संदेश यह है कि इंसान को किसी भी अच्छे काम के लिए क़ुरबानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए। क़ुरबानी का मतलब सिर्फ़ हत्या से भी नहीं है। अगर कोई अपने पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार या किसी भी ज़रूरतमंद को अपने हिस्से का खाना, अपने हिस्से के कपड़े, पैसे और वक़्त भी देता है तो वह भी क़ुरबानी ही मानी जाएगी।

इसमें जाति और धर्म का भेदभाव भी नहीं होना चाहिए। लेकिन इसमें किसी तरह की चालाकी या ख़ुदग़र्ज़ी नहीं होनी चाहिए। जब सबके दिलों में क़ुरबानी का जज़्बा होता है तभी प्यार-मुहब्बत और भाईचारा बढ़ता है। समाज में सेहतमंद माहौल बनता है।

हिस्सेदारी

हिस्सेदारी भी बकरा ईद का एक बहुत बड़ा संदेश है। क़ुरबानी के बकरे के मांस को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा ग़रीबों के लिए, दूसरा पड़ोसियों और रिश्तेदारों के लिए और तीसरा अपने लिए। संदेश साफ़ है कि हमेशा अपने साथ दूसरों का ख़्याल रखा जाना चाहिए।

अगर अपनी ज़रूरत से ज़्यादा कुछ भी चीज़ हो तो उसे आपस में बांटा जाना चाहिए। सिर्फ़ क़ुरबानी के मांस पर ही नहीं यह बात ज़िंदगी हर चीज़ पर लागू होती है । इस्लाम में कहा गया है कि अगर आपके पास खाने के लिए सब कुछ है तो इस बात का ख़्याल रखना आपका फ़र्ज़ है कि आपका पड़ोसी भूखा न सोए। इस मामले में भी जाति और धर्म का फ़र्क़ नहीं किया जाना चाए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *