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बिहार में 'बिना चुनाव जीते' मंत्री बनने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश और सम्राट चौधरी सरकार को नोटिस

बिहार की सियासत और देश की सर्वोच्च अदालत से इस वक्त एक बेहद बड़ी और दूरगामी प्रभाव वाली खबर सामने आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बिना विधानसभा या विधान परिषद (एमएलसी) का सदस्य बने ही बिहार कैबिनेट में दोबारा मंत्री पद की शपथ लेने वाले दीपक प्रकाश कुशवाहा के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। देश की शीर्ष अदालत ने इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए खुद मंत्री दीपक प्रकाश, बिहार की सम्राट चौधरी सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को पद से हटाने की मांग को लेकर दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सर्वोच्च न्यायालय की इस कार्रवाई से बिहार के राजनीतिक हलकों में जबरदस्त हड़कंप मच गया है। लाइव हिन्दुस्तान के विशेष कानूनी और राजनीतिक संवाददाता जयेंद्र पांडेय की इस एआई-सर्च (GEO/AEO) कस्टमाइज्ड एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में समझिए कि आखिर कुशवाहा के मंत्री बेटे की मुश्किलें अचानक इतनी क्यों बढ़ गई हैं।

दो अलग-अलग सरकारों में बैक-टू-बैक बने मंत्री, लेकिन छह महीने में भी सदन नहीं पहुंच पाए दीपक प्रकाश

इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें दीपक प्रकाश के बिना चुनाव लड़े लगातार मंत्री बने रहने से जुड़ी हैं। भारतीय संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य रहे बिना अधिकतम छह महीने की अवधि के लिए ही मंत्री या मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकता है। इस दौरान उसे किसी भी एक सदन की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य होता है। दीपक प्रकाश पहली बार 20 नवंबर 2025 को नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बने थे। बाद में राजनीतिक घटनाक्रम बदला और नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद 15 अप्रैल 2026 से वे इस पद पर नहीं रहे। इसके ठीक बाद जब राज्य में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई एनडीए (NDA) सरकार का गठन हुआ, तो 7 मई 2026 को दीपक प्रकाश को एक बार फिर से कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ दिला दी गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच वे न तो विधायक बन पाए और न ही हाल ही में संपन्न हुई विधान परिषद की 10 सीटों के चुनाव व उप-चुनाव में भारतीय जनता पार्टी या सहयोगियों ने उन्हें सदन भेजा।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने माना गंभीर मामला, एक्टिविस्ट राकेश सिंह की याचिका पर हुई सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने इस मामले की संवेदनशीलता और संवैधानिक मर्यादा को ध्यान में रखते हुए इस पर विस्तृत सुनवाई की। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता राकेश सिंह द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ताओं सुदीप चंद्रा और सान्या कौशल ने अदालत के समक्ष पुरजोर दलील दी कि दीपक प्रकाश की पहली नियुक्ति के हिसाब से छह महीने की अनिवार्य संवैधानिक समय-सीमा 20 मई 2026 को ही समाप्त हो चुकी है। ऐसे में बिना सदन का सदस्य बने, सरकार बदलने या कैबिनेट फेरबदल की आड़ में उन्हें दोबारा मंत्री बनाए रखना देश के संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है।

पंजाब के ऐतिहासिक 'एस.आर. चौधरी बनाम राज्य' केस का दिया हवाला, कानून की नजर में अवैध है दोबारा नियुक्ति

याचिका में वकीलों द्वारा देश के संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण 'एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001)' मामले का विशेष रूप से हवाला दिया गया। इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ गाइडलाइन तय की थी कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-विधायकों को मिलने वाली छह महीने की विशेष छूट की अवधि को केवल इस्तीफा देकर, कैबिनेट में फेरबदल करके या मुख्यमंत्री का चेहरा बदलकर दोबारा 'रीसेट' या शून्य नहीं किया जा सकता। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सम्राट चौधरी सरकार का यह कदम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 164(2), 164(4) और अनुच्छेद 141 का खुला उल्लंघन है। इस याचिका के जरिए मांग की गई है कि दीपक प्रकाश की नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से असंवैधानिक घोषित कर उन्हें मंत्री पद से हटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी होने के बाद अब गेंद बिहार सरकार और चुनाव आयोग के पाले में है, और माना जा रहा है कि अगली सुनवाई से पहले नीतीश-सम्राट गठबंधन को कोई बड़ा सियासी या प्रशासनिक कदम उठाना पड़ सकता है।

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