मायावती की दलित सियासत में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘सेंधमारी’

सत्ता का सुख पाने के लिए हमारे नेता कितने प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं कि अभी तक ‘आम वोटर’ भ्रमित होता रहा है । नेताओं के लंबे-चौड़े वायदों का जनता आकलन नहीं कर पाती है । ‌राजनीतिक पार्टियों और नेताओं में चुनाव के दौरान सत्ता पर काबिज होने के लिए ‘सियासी दांव’ चलने की होड़ लगी रहती है ।

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आज बात होगी बिहार की । इन दिनों राज्य में ‘राजनीति गर्म’ है । पिछले दिनों जब चुनाव आयोग ने बिहार के विधान सभा चुनाव 29 नवंबर से पहले कराने की घोषणा की तभी से भाजपा, जेडीयू, राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी में लोकलुभावन, प्रलोभन, आश्वासन और जातिगत समीकरण समेत तमाम मुद्दे खंगाले जा रहे हैं ।

मौजूदा समय में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं । वे पिछले 15 वर्षों से राज्य की सत्ता संभाले हुए हैं ।‌ अब नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव को देखते हुए नया दांव ‘दलित कार्ड’ खेला है । सीएम नीतीश की जब इस सियासी हथकंडे की गूंज उत्तर प्रदेश तक पहुंची तब दलितों की ‘राजनीतिक ठेकेदार’ बसपा प्रमुख मायावती आग बबूला हो गईं हैं ।

हम बात को आगे बढ़ाएं उससे पहले बता दें कि लगभग आठ वर्षों से बसपा प्रमुख खाली बैठी हुईं हैं । मायावती न तो उत्तर प्रदेश न केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो पा रही हैं । अब उन्होंने सोचा बिहार विधानसभा चुनाव में क्यों न पार्टी की ‘किस्मत आजमाई जाए । यहां हम आपको बता दें कि मायावती की अभी तक की राजनीति ‘दलितों के इर्द-गिर्द’ ही घूमती रही है । अब आगे चर्चा करते हैं ।

जब नीतीश कुमार ने दलित वर्ग को रिझाने के लिए चुनावी हथकंडा अपनाया तब मायावती से रहा नहीं गया । बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश से ही मुख्यमंत्री नीतीश पर ताबड़तोड़ हमले कर डालें । मायावती ने बिहार के दलितों को नीतीश कुमार से बचने के लिए आगाह भी कर डाला । आइए आपको बताते हैं नीतीश कुमार ने बिहार के दलितों को लेकर क्या घोषणा की है ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बिहार में चुनावी दलित कार्ड यह है—

राज्य विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलित कार्ड खेल दिया है । सीएम नीतीश ने नए आदेश में कहा है अगर राज्य के किसी अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से आने वाले लोगों की हत्या हो जाती है तो उसके परिवार के एक सदस्य को ‘सरकारी नौकरी’ हम देंगे ।

सियासत के जानकारों का कहना है कि नीतीश कुमार यह नया आदेश चुनाव से पहले दलित आदिवासी समुदाय को लुभाने के लिए किया गया चुनावी हथकंडा है । दूसरी ओर रामविलास पासवान और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी भी दलितों के ऊपर सियासत करती आई है । अब देखना होगा नितीश कुमार का यह नया दांव बहुजन समाजवादी पार्टी पर कितना भारी पड़ता है ।

आपको बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी समुदाय से आते हैं । अब मुख्यमंत्री को नया सियासी हथकंडा बनाए रखना आसान नहीं होगा क्योंकि राज्य में लोजपा भी दलितों के मुद्दे पर मुखर है । दूसरी ओर मायावती पूरा प्रयास करेंगी कि राज्य में दलित वोट उनसे बिखरने न पाए । इसके साथ ही नीतीश कुमार को पिछड़ा वर्ग को भी साधने की चुनौती कम नहीं होगी ।

मायावती का चुनावी जंग, दलित वर्ग नीतीश कुमार के बहकावे में नहीं आएंगे—

दलितों को प्रलोभन दिए जाने के बाद मायावती ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधा है । बसपा प्रमुख ने कहा कि बिहार की सरकार प्रलोभन देकर दलित और आदिवासी वोट के जुगाड़ में लगी हुई है । मायावती ने कहा कि अगर बिहार की नीतीश सरकार को इन वर्गों के हितों की इतनी ही चिंता थी तो उनकी सरकार अब तक ‘क्यों सोई रही’ । उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को इस मामले में यूपी की बसपा सरकार से बहुत कुछ ‘सीखना’ चाहिए था ।

बसपा प्रमुख ने कहा कि बिहार के दलित मुख्यमंत्री के बहकावे में नहीं आएंगे ।‌ उन्होंने कहा कि बिहार में हुए दलितों पर अत्याचार पर अभी तक नीतीश कुमार खामोश बैठे रहे हैं, जब चुनाव का समय है तब वह इस पर राजनीति कर रहे हैं । मायावती ने कहा कि बिहार सरकार अपने मंसूबे में कभी कामयाब नहीं होगी ।

बता दें कि मायावती ने बिहार चुनाव में सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का एलान किया है। हालांकि उत्तर प्रदेश में चार बार सत्ता पाने वाली बसपा बिहार में अभी तक अपनी जड़ें जमाने में कामयाब नहीं रही है। बसपा बिहार में कभी भी दो अंकों में सीटें नहीं जीत सकी जबकि यहां 16 फीसदी दलित मतदाता हैं । दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी की बिहार में ‘राह इतनी आसान नहीं होगी’ । क्योंकि उसे लोक जनशक्ति पार्टी जो कि दलित पहचान के रूप में भी जानी जाती है, उससे टक्कर लेनी होगी ।

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