भारत में फादर्स डे : दो दशकों में तेजी से फैला पिता को सम्मान देने का पर्व

भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में पिता का स्थान सर्वोच्च होता है। पिता और पूर्वजों को सम्मान और श्रद्धांजलि देने के लिए वर्ष में दो बार चैत और क्वार मास में पितृ पक्ष या पितृ पखवारा होता है। पूरे पखवारे लोग श्राद्ध करते हैं और तिथि के दिन दान आदि करते हैं। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में विगत कुछ दशकों से भारत में पिता को सम्मान देने के लिए फादर्स डे मनाया जाने लगा है। हालांकि इस दिन देश में सार्वजनिक अवकाश नहीं होता है। इसके बावजूद यह काफी प्रचलित हो गया है। सोशल मीडिया के इस दौर में तो फादर्स डे पर बधाइयों का तांता लगा रहता है। मुख्य धारा की मीडिया में भी फादर्स डे पर ख़ास कवरेज होती है। अखबार तो इस दिन को पूरा पेज ही देने लगे हैं।

फादर्स डे पर क्या बच्चे, क्या बूढ़े सभी अपने पिता के साथ सोशल मीडिया में फोटो शेयर करते है और मेसेज के द्वारा उन्हें बधाई देते है। अब तो इस दिन स्कूलों में बच्चों को उनके जीवन में पिता की भूमिका के महत्व को सीखने के लिए सांकृतिक एवं सामजिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। अब तो सामाजिक संगठन भी फादर्स डे पर कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। नई पीढ़ी को पिता और परिवार के संस्कारों के बारे में बताया जाता है। बच्चे पिता को समर्पित कविताएं व कहानिया सुनाते हैं।

हालांकि भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा में हर दिन और हर पल पिता को सम्मान देने का है। यहां दिन की शुरुआत ही माता और पिता के चरण स्पर्श से होती है। रूढ़िवादियों का कहना है कि पिता या पूर्वजों को सम्मान देने के लिए किसी खाद दिन की जरुरत नहीं है। फादर्स डे पश्चिमी सभ्यता की नकल है। वहीँ प्रगतिशील सोच के लोगों का कहना है कि फादर्स डे की अवधारणा कहीं की हो, इसी बहाने कम से कम एक दिन तो बच्चे अच्छे संकल्पों से साथ पिता को सम्मान देते हैं। उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते हैं। अगर हम पिता को हमेशा सम्मान देते रहेंगे तो परिवार के साथ ही समाज भी आदर्श पथ पर अग्रसर होगा।

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