आज अमृत महोत्सव के मौके पर इस तरह महसूस करें , गांधीजी के विचार

मोहनदास करमचंद गांधी के व्यक्तित्व विकास में दक्षिण दक्षिण अफ्रीका जाने पश्चात अद्भुत अंतर आया। दक्षिण अफ्रीका में अपने कार्य के कारण प्रसिद्धि उन्हें मिल चुकी थी,

मोहनदास करमचंद गांधी के व्यक्तित्व विकास में दक्षिण दक्षिण अफ्रीका जाने पश्चात अद्भुत अंतर आया। दक्षिण अफ्रीका में अपने कार्य के कारण प्रसिद्धि उन्हें मिल चुकी थी, मगर वह महात्मा नहीं बने थे। उनकी ओर देश का ध्यान तब गया, जब गागर में सागर के मंतव्य वाले 20 छोटे-छोटे अध्याय में उन्होंने हिंद स्वराज्य पुस्तक लिखी। इसमें भारत की दशा के संबंध में वह कहते हैं कि उस पर विचार करने से उनकी आंखों में पानी भर आता है, गला सूख जाता है! उनके शब्दों में, ‘मेरी पक्की राय है कि हिंदुस्तान अंग्रेजों से नहीं, आजकल की सभ्यता से कुचला जा रहा है। मुझे धर्म प्यारा है।

Mahatma Gandhi

इसीलिए पहला दुख मुङो यह है कि हिंदुस्तान धर्मभ्रष्ट होता जा रहा है। धर्म का अर्थ मैं यहां हिंदू, मुस्लिम नहीं करता, पर इन सब धर्मों के अंदर जो धर्म है, वह हिंदुस्तान से जा रहा है। हम ईश्वर से विमुख होते जा रहे हैं।’ वह उन्हें भी उत्तर देते हैं, जो मानते थे कि अंग्रेजों ने हमें शांति का सुख दिया है।

गांधी इसे शांति का सुख नहीं मानते थे। वह कहते थे कि इस शांति से हम डरपोक बन गए हैं। हम पर जुल्म होता है तो उसे बर्दाश्त करना चाहिए, पर दूसरे लोग हमें उस जुल्म से बचाएं, यह तो हमारे लिए बिल्कुल कलंक जैसा है। गांधी जी इस संबंध में कहते हैं कि यह अंग्रेजों का फैलाया भ्रम है कि उनके आने के पहले भारत एक राष्ट्र नहीं था और एक राष्ट्र बनाने में आपको सैकड़ों वर्ष लगेंगे। जब अंग्रेज हिंदुस्तान में नहीं थे तब हम एक राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था।

तभी तो अंग्रेजों ने यहां एक-राज्य कायम किया। भेद तो हमारे बीच बाद में उन्होंने ही पैदा किए। वह यह भी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं था, लेकिन हमारे मुख्य लोग पैदल या बैलगाड़ी में हिंदुस्तान का सफर करते थे। वे एक-दूसरे की भाषा सीखते थे और उनके बीच कोई अंतर नहीं था। वह जानते थे कि कुदरत ने हिंदुस्तान को एक देश बनाया है, इसलिए वह एक राष्ट्र होना चाहिए। उन्होंने अलग-अलग स्थान तय करके लोगों को एकता का विचार इस तरह दिया, जैसा दुनिया में कहीं नहीं दिया गया।
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी गांधी जी को याद किया जाएगा।

अनेक स्तरों पर यह चर्चा अवश्य होगी कि क्या गांधी को भारत ने सचमुच याद रखा है? यदि ऐसा होता तो 1947 के बाद या 1950 में संविधान लागू होने के बाद नीति-निर्धारकों ने उनकी बुनियादी तालीम की संकल्पना को गहराई से समझा होता और उसे लागू किया होता। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं किया गया। बापू जानते थे कि जो शिक्षा व्यवस्था विदेश से लाकर भारत में रोपित की गई, वह एक ऐसी फसल थी, जिसने खेत में पहले होने वाली फसल को पूरी तरह रौंद दिया।

देश को इस जमीन को उर्वरा बनाना था, उस पहले वाली फसल को फिर से लहलहाना था, क्योंकि वही उस खेत के लिए उपयुक्त थी, वही सभी की आवश्यकता पूíत कर सकती थी। वही सर्वमान्य हो सकती थी। उसी में भारत की संस्कृति की गंध रची-बसी थी। इसी में वह शक्ति थी, जो सहिष्णुता को सर्वव्यापी फैलाव दे सकती।

अक्टूबर 1927 में उन्होंने कुछ अत्यंत साहसपूर्ण विश्लेषण दिए, जो आज के संदर्भ और स्थिति में न केवल भारत का वरन विश्व का पथ प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने कहा था, ‘मैं जितने धर्मों को जानता हूं उन सबमें हिंदू धर्म सबसे अधिक सहिष्णु है। इसमें कट्टरता का जो अभाव है, वह मुझे पसंद आता है, क्योंकि इसमें उसके अनुयायी को आत्माभिव्यक्ति के लिए अधिक से अधिक अवसर मिलता है।

यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सामान्य जन से लेकर बौद्धिक वर्ग तक गांधी को चर्चा के स्तर पर सम्मान दिया जाता है, उनके महात्मा होने को सराहा जाता है, मगर उसके बाद आधुनिकता की चकाचौंध में उनके सिद्धांतों को बिना कहे ही दरकिनार कर दिया जाता है। अनेक राजनीतिक दल अपने को गांधी की विरासत का हकदार घोषित करते रहते हैं, मगर उनके आचार-विचार-व्यवहार में गांधी तत्व इस सीमा तक तिरोहित हो चुका है कि उसे खोज पाना असंभव है। इस वर्ष गांधी जी का स्मरण अमृत महोत्सव के आलोक में किया जा रहा है।

महात्मा गांधी की उपस्थिति हर तरफ आज भी दिखाई देती, यदि स्वतंत्रता के बाद लिखा गया भारत का इतिहास किसी विचारधारा के अनुमोदन हेतु न लिखा गया होता, किसी पंथ या जातीय समूह के लिए केवल चुनाव जीतने के लिए। मगर स्वतंत्र भारत में जिनके लिए केवल चुनाव में जीत और सत्ता ही लक्ष्य रह गए, वे आज भी वैमनस्य फैलाने में लगे हुए हैं। आज देश को ऐसे जन-नायकों की महती आवश्यकता है, जो कह सकें कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।

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