Gyanvapi Mosque Dispute: एक नजर में जानें विवाद की वजह और कब-कब, क्या-क्या हुआ

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद वैसे तो अभी अदालत में ही है। बीते साल अगस्त महीने में 5 महिलाओं ने वाराणसी...

वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद वैसे तो अभी अदालत में ही है। बीते साल अगस्त महीने में 5 महिलाओं ने वाराणसी के एक कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी और ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर समेत कई विग्रहों में पूजन-दर्शन की इजाजत मांगने के साथ ही मस्जिद का सर्वे कराने की मांग की थी।

Gyanvapi Mosque Dispute

इसी मुकदमे की सुनवाई करते हुए अदालत ने यहां सर्वे करने की इजाजत दी थी। अब कोर्ट के आदेश पर सर्वे का काम पूरा हो चुका है लेकिन इससे काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को हवा मिल गई है।
गौरतलब है कि काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला पिछले 31 साल से कोर्ट में है जबकि, ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास 350 साल से भी अधिक पुराना है। आइये सबसे पहले जानते हैं कि क्या है पूरा मामला।

ये है विवाद की जड़?

इतिहासकारों की मानें तो काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद काफी हद तक अयोध्या विवाद जैसा ही है। बस फर्क इतना है कि अयोध्या मंदिर गिराकर मस्जिद बना दी गई थी लेकिन वाराणसी में मंदिर-मस्जिद दोनों ही बने हुए हैं। काशी में मंदिर मस्जिद विवाद को लेकर हिंदू पक्ष का कहना है कि 1669 में मुगल शासक औरंगजेब ने यहां स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के कुछ हिस्से को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यहां मंदिर नहीं था और हमेशा से ही मस्जिद बनी थी।

हिंदू पक्ष की तीन बड़ी मांगें…

पहलीः कोर्ट पूरे ज्ञानवापी परिसर को काशी मंदिर का हिस्सा घोषित करे।
दूसरीः करत द्वारा मस्जिद को ढहाने का आदेश जारी किया जाये और मुस्लिमों का इस परिसर में आना निषिद्ध किया जाये।
तीसरीः हिंदुओं को यहां पर मंदिर के पुनर्निर्माण की अनुमति दी जाये।

अब जानिए, कब-कब क्या हुआ?

1919 : स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की तरफ से वाराणसी की एक अदालत में पहली याचिका दायर हुई। उस समय भी याचिकाकर्ता ने कोर्ट से ज्ञानवापी परिसर में पूजा करने की इजाजत मांगी थी।

1998 : ज्ञानवापी मस्जिद का जिम्मा संभालने वाली अंजुमान इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। कमेटी ने कहा कि इस मामले में सिविल कोर्ट कोई फैसला नहीं ले सकता। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर सिविल कोर्ट में सुनवाई पर रोक लगा दी गई और 22 साल तक इस मामले पर सुनवाई नहीं हुई।

2019 : स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की तरफ से विजय शंकर रस्तोगी ने एक बार फिर से वाराणसी जिला अदालत में वाद दायर किया। इस याचिका में ज्ञानवापी परिसर का सर्वे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) से कराने की मांग की गई।

2020 : अंजुमान इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने ज्ञानवापी परिसर का ASI से सर्वे कराने की मांग वाली याचिका का कोर्ट में विरोध जताया। इसी साल विजय शंकर रस्तोगी ने निचली अदालत का रुख भी किया और मामले की सुनवाई दोबारा से शुरू करने की मांग की। रस्तोगी ने दलील दी कि क्योंकि हाईकोर्ट ने स्टे को आगे नहीं बढ़ाया है। ऐसे में इस मामले की सुनवाई फिर से शुरू की जानी चाहिए।

क्या इस वजह से कमजोर पड़ सकता है केस?

– काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के मध्य विवाद का केस एक कानून की वजह से कमजोर पड़ सकता है। ये कानून है प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट। इस कानून को 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने पास किया था।

– इस कानून के मुताबिक आजादी के समय यानी 15 अगस्त 1947 केसमय तक जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, वह हमेशा उसी रूप में रहेगा। उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता।

– इस कानून को लेकर हिंदू पक्ष का कहना है कि इस मामले में ये कानून लागू नहीं होता क्योंकि मस्जिद को मंदिर के अवशेषों के ऊपर बनाया गया था और आज भी मंदिर के हिस्से मौजूद हैं। वहीं, मुस्लिम पक्ष का मानना है कि इस कानून की वजह से विवाद पर कोई भी फैसला नहीं लिया जा सकता।

– बता दें कि 1991 के इस कानून में अयोध्या विवाद को छूट दी गई थी। कहा जाता है कि चूँकि अयोध्या विवाद आजादी से पहले से चला आ रहा था इसलिए इसे छूट थी। मालूम हो कि अयोध्या मामले में 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओं के पक्ष में फैसला सुनाया था। इस फैसलेके आने के बाद ही वहां पर मंदिर निर्माण शुरू कर दिया गया है।