उत्तराखंड में मानसून को लेकर सरकार मुस्तैद: सतपाल महाराज की अधिकारियों को दो टूक– 'कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए तैयारी'
उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में बादलों ने डेरा डालना शुरू कर दिया है, जिसके साथ ही राज्य में मानसून की आहट तेज हो गई है। हर साल मानसून उत्तराखंड के लिए भूस्खलन (Landslide), अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं की कड़ी परीक्षा लेकर आता है। इन संभावित खतरों और चुनौतियों से निपटने के लिए धामी सरकार की प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह एक्टिव मोड में आ गई है।
देहरादून में गुरुवार (25 जून 2026) को प्रदेश के लोक निर्माण, पर्यटन एवं सिंचाई मंत्री सतपाल महाराज (Satpal Maharaj) ने विभिन्न विभागों के आला अधिकारियों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की। इस बैठक का मुख्य एजेंडा 'योजना बनाने' से ज्यादा 'जमीनी अमल और त्वरित कार्रवाई' पर केंद्रित रहा।
कागजी खानापूर्ति बर्दाश्त नहीं, नालों की सफाई पहली प्राथमिकता
मानसून के दौरान शहरों में होने वाले जलभराव (Waterlogging) को लेकर मंत्री सतपाल महाराज ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने सिंचाई और नगर निकाय के अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा:
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ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त हो: राज्य के सभी छोटे-बड़े नालों, नहरों और ड्रेनेज सिस्टम की सफाई का काम युद्धस्तर पर पूरा किया जाए।
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जमीन पर दिखे असर: यह सफाई व्यवस्था सिर्फ कागजी आंकड़ों और फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पहली तेज बारिश होते ही यदि सड़कों पर पानी भरा, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
जीवनरेखा बचाने का मिशन: लक्ष्य से ज्यादा सुधारी गईं सड़कें
पहाड़ी राज्यों में सड़कें सिर्फ यातायात का माध्यम नहीं बल्कि आपदा के समय जीवनरेखा (Lifeline) होती हैं। बारिश में संपर्क मार्ग टूटने से पहाड़ी गांवों का संपर्क जिला मुख्यालयों से पूरी तरह कट जाता है।
इस चुनौती का सामना करने के लिए लोनिवि (PWD) ने इस बार रिकॉर्ड काम किया है। सतपाल महाराज ने बताया कि विभाग ने सक्रियता दिखाते हुए मानसून से पहले ही निर्धारित लक्ष्य से अधिक कुल 3,968 पैचवर्क (सड़कों के गड्ढे भरने का काम) सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। यह मुस्तैदी उन सुदूर पहाड़ी ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत है जो हर साल टूटी सड़कों के कारण आवश्यक सेवाओं से वंचित हो जाते थे।
संवेदनशील जोन में जेसीबी (JCB) और पोकलैंड मशीनें एडवांस तैनात
आपदा प्रबंधन को गति देने के लिए सरकार ने 'प्री-पोजीशनिंग' (पहले से तैनाती) की रणनीति अपनाई है:
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चिन्हित हॉटस्पॉट: राज्य के उन सभी संवेदनशील और भूस्खलन प्रभावित रास्तों व पहाड़ों को पहले ही चिन्हित कर लिया गया है, जहां अक्सर मलबा आने से मार्ग अवरुद्ध होते हैं।
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नो-वेटिंग टाइम: इन सभी लोकेशंस पर भारी मशीनरी जैसे जेसीबी, पोकलैंड और डंपर को अभी से ऑपरेटरों के साथ तैनात कर दिया गया है। मकसद साफ है कि आपदा आने के बाद मशीनें भेजने में समय बर्बाद न हो, बल्कि तुरंत रास्ता साफ करने का काम शुरू किया जा सके।
24x7 एक्टिव रहेंगे कंट्रोल रूम, यात्रियों को मिलेंगे वैकल्पिक मार्ग
चारधाम यात्रा और मानसून के मद्देनजर राज्य में 24 घंटे चलने वाले नियंत्रण कक्ष (Control Rooms) स्थापित कर दिए गए हैं। ये कंट्रोल रूम सीधे आपदा प्रबंधन केंद्र से जुड़े रहेंगे।
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त्वरित सूचना: जैसे ही किसी मार्ग के बंद होने या आपदा की सूचना मिलेगी, क्विक रिस्पांस टीमें (QRT) तुरंत हरकत में आ जाएंगी।
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डायवर्जन प्लान: यदि भारी बारिश के कारण कोई मुख्य हाईवे या मार्ग बंद होता है, तो यात्रियों और तीर्थयात्रियों को रास्ते में फंसे रहने के बजाय तुरंत वैकल्पिक मार्गों (Alternate Routes) की सटीक जानकारी दी जाएगी ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।