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TET Rule Change: 25 लाख अनुभवी शिक्षकों की नौकरी पर संकट पीएम मोदी से गुहार, क्या बदलेगा नियम

देश की शिक्षा व्यवस्था को दशकों तक अपने खून-पसीने से सींचने वाले वरिष्ठ शिक्षकों के सामने आज करियर के सबसे बड़े संकट की स्थिति पैदा हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया और दूरगामी फैसले ने साल 2010 से पहले नियुक्त हुए उन सभी शिक्षकों के लिए भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को अनिवार्य कर दिया है, जिन्होंने अब तक इसे पास नहीं किया है। इस ऐतिहासिक आदेश के बाद से देशभर के शिक्षा जगत में हड़कंप मचा हुआ है और लाखों शिक्षक भारी मानसिक तनाव तथा असमंजस के दौर से गुजर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और टीईटी की अनिवार्यता

अदालत के इस फैसले का सीधा असर उन शिक्षकों पर पड़ रहा है जो अपने करियर के अंतिम पड़ाव या रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके हैं। प्रभावित शिक्षकों का तर्क है कि इस उम्र में दोबारा किताबें उठाना और प्रतियोगी परीक्षा में बैठना उनके लिए व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है। शिक्षकों का सवाल है कि जब किसी अन्य सरकारी सेवा में इतने वर्षों के अनुभव के बाद दोबारा पात्रता परीक्षा देने का कोई नियम नहीं है, तो केवल शिक्षा विभाग में ही ऐसा क्यों किया जा रहा है? हालांकि, नौकरी खोने के डर से कई वरिष्ठ शिक्षक भारी मानसिक तनाव के बीच भी मजबूरन पढ़ाई में जुट गए हैं।

शिक्षक संगठन ABRSM ने संभाला मोर्चा, पीएम को लिखेंगे पत्र

शिक्षकों के अधिकारों और उनकी नौकरी की सुरक्षा को देखते हुए दिल्ली के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के प्रमुख शिक्षक संगठन 'अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ' (ABRSM) ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। संगठन का दृढ़ विश्वास है कि नियमों की तकनीकी पेचीदगियों के कारण दशकों से बच्चों का भविष्य संवार रहे इन अनुभवी शिक्षकों के करियर पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए। इसी सिलसिले में एबीआरएसएम (ABRSM) की दिल्ली इकाई आगामी 18 जून को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को एक औपचारिक पत्र सौंपकर विशेष प्रशासनिक सुरक्षा कवच देने की मांग करेगी।

देशव्यापी असर: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में मचेगा हड़कंप

यह संकट किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने जा रहा है, जिससे लगभग 25 लाख शिक्षक सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। आंकड़ों के नजरिए से देखें तो सबसे गंभीर स्थिति उत्तर प्रदेश में है, जहां करीब 1.80 लाख नॉन-टीईटी शिक्षकों के करियर पर तलवार लटक रही है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में 1.5 लाख, छत्तीसगढ़ में 85 हजार, और राजस्थान में तृतीय श्रेणी (लेवल-1 और लेवल-2) के लगभग 80 हजार शिक्षक इस दायरे में आ रहे हैं। वहीं झारखंड के 40 हजार और उत्तराखंड के लगभग 24 हजार शिक्षकों को भी अब अपनी नौकरी सुरक्षित रखने के लिए इस परीक्षा को पास करने की चुनौती का सामना करना होगा।

पिछली तारीखों से नए नियमों को लागू करने का विरोध

शिक्षक संगठन ने प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री को भेजे जाने वाले पत्र में मुख्य रूप से यह दलील दी है कि साल 2010 के बाद शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून और अन्य प्रशासनिक बदलावों के कारण भर्ती की प्रक्रिया और नियम पूरी तरह बदल गए हैं। ऐसे में इन नए नियमों को पिछली तारीखों (Retrospective Effect) से लागू करना सरासर अन्याय होगा। संगठन का कहना है कि इस प्रशासनिक अनिश्चितता के चलते शिक्षक गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं, जिसका सीधा और नकारात्मक असर स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के माहौल पर पड़ सकता है। संगठन को पूरी उम्मीद है कि केंद्र सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी और पुराने शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी करेगी।

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