धार्मिक नगरी हरिद्वार में कल निकलेगी निरंजन अखाड़े की पहली पेशवाई

उत्तराखंड सरकार की ओर से कहा गया है कि इस बार का महाकुंभ केवल एक महीने यानी 30 दिनों का होगाा। इस बार एक अप्रैल से शुरू होगा और 30 अप्रैल 2021 को समाप्त हो जाएगा। कोविड-19 महामारी को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की जारी की गई गाइडलाइन से साधु-संतों में भारी नाराजगी भी व्याप्त है।

शंभू नाथ गौतम, वरिष्ठ पत्रकार

आइए आपको धार्मिक नगरी हरिद्वार लिए चलते हैं। शहर भर में कुंभ के आयोजन को लेकर धार्मिक रंग चढ़ने लगा है। यही नहीं सांस्कृतिक और विरासत की झांकियों से उत्तराखंड सरकार ने खूब सजाया और संवारा है।

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हरिद्वार में होने वाले महाकुंभ को लेकर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं । लाखों लोग इस आस्था के महासंगम में डुबकी लगाने के लिए तैयार हैं। भले ही अभी कोरोना महामारी का प्रकोप एक बार फिर से जोर पकड़ने लगा है लेकिन हरिद्वार हर की पैड़ी पर कलकल बहती मां गंगा देश और विदेश के श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रही है। अब बात करते हैं कल को होने वाले कुंभ में पेशवाई अखाड़े को लेकर।

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बता दें कि हरिद्वार कुंभ के लिए बुधवार को सबसे पहले निरंजनी अखाड़े की पेशवाई निकल रही है। देश भर से साधु-संत पेशवाई के लिए पहुंच गए हैं। बुधवार दोपहर निरंजनी अखाड़े की पेशवाई का आयोजन शुरू होगा। ये पेशवाई पूरे शहर से होते हुए निरंजनी अखाड़े में पहुंचेगी।

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कुंभ के दौरान पेशवाई अखाड़ों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है और हर एक अखाड़ा अपनी पेशवाई को भव्य रूप देने की कोशिश भी करता है। इस बार की पेशवाई पिछले बार के कुंभ से भी भव्य होगी और इसमें कई चीजें आकर्षण का केंद्र रहेंगी। ये पेशवाई तीन किलोमीटर लंबी रहेगी, पेशवाई के लिए रथ, सिंहासन, हाथी ऊंट, घोड़े आदि मंगाए गए हैं।

उत्तराखंड सरकार की ओर से कहा गया है कि इस बार का महाकुंभ केवल एक महीने यानी 30 दिनों का होगाा। इस बार एक अप्रैल से शुरू होगा और 30 अप्रैल 2021 को समाप्त हो जाएगा। कोविड-19 महामारी को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की जारी की गई गाइडलाइन से साधु-संतों में भारी नाराजगी भी व्याप्त है। आइए जानते हैं पेशवाई और अखाड़ों के बारे में।

अखाड़ा और पेशवाई का इतिहास प्राचीन काल से चला आ रहा है—

हमारे देश में पेशवाई का इतिहास प्राचीन काल से चला आ रहा है। दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले साधु संत कुंभ नगरियों में आते हैं। सबसे पहले वे अखाड़ा की छावनी में डेरा जमाते हैं उसके बाद अखाड़ों की ओर बढ़ते हैं। इसी परंपरा को अखाड़ों की पेशवाई कहा जाता है। चार शहरों में हर 12 साल के बाद कुंभ मेले का आयोजन होता है।

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बता दें कि हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की शिप्रा, नासिक की गोदावरी और प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों पर कुंभ मेले लगते हैं। सभी अखाड़ों की ओर से साधु संतों के लिए छावनियां बनाई जाती हैं, जब ये साधु संत छावनी से निकल अखाड़े में प्रवेश करते हैं तो उस यात्रा को पेशवाई कहा जाता है।

अखाड़े की पेशवाई एक तरह से धर्म और भारतीय संस्कृति के इतिहास का शक्ति प्रदर्शन भी होता है। अखाड़ों की स्थापना भारतीय धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए की गई थी। इसलिए अखाड़ों के साधु संत पेशवाई में तलवार, भाले, गदा, धनुष जैसे अस्त्र-शस्त्र लेकर पेशवाइयों में शामिल होते हैं।

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कहा जाता है कि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़े बनाए थे। तब से वही अखाड़े बने हुए थे, लेकिन इस बार एक और अखाड़ा जुड़ गया है, जिस कारण कुंभ में 14 अखाड़ों की पेशवाई देखने की मिलेगी। आइए जानते इन अखाड़ों के नाम क्या हैं।

अटल अखाड़ा, अवाहन अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, पंचाग्नि अखाड़ा, महानिर्वाण अखाड़ा,आनंद अखाड़ा निर्मोही अखाड़ा, बड़ा उदासीन पंचायती अखाड़ा, नया उदासीन अखाड़ा, निर्मल अखाड़ा, वैष्णव अखाड़ा, नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, जूना अखाड़ा,‌ और किन्नर अखाड़ा, अभी तक कुंभ में 13 अखाड़ों की पेशवाई होती थी, लेकिन इस बार किन्नर अखाड़ा भी शामिल हो चुका है ।

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