यहाँ गधे मेले की शुरूआत शाहरुख़-सलमान-रणवीर व कटरीना नाम के गधों की कीमत जानकर दंग रह जायेंगे आप!

भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट में मंदाकिनी नदी किनारे लगने वाले इस ऐतिहासिक गधे मेले की शुरुआत मुगल बादशाह औरंगजेब ने की थी।

चित्रकूट,15 नवम्बर। चित्रकूट में दीपदान के बाद ऐतिहासिक मुगल कालीन गधे मेले की शुरूआत हो गई है। मेले में शाहरुख़, सलमान,रणवीर,कटरीना आदि फिल्मी सितारों के नाम से 50 हजार से लेकर दो लाख तक के गधों की बिक्री हो रही है। इस मेले में मध्य प्रदेश,उत्तर प्रदेश,राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ समेत कई प्रदेशों के व्यापारी अपने-अपने गधों के साथ यहां कारोबार के लिए आये हुए है।

GADHE MELE

भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट में मंदाकिनी नदी किनारे लगने वाले इस ऐतिहासिक गधे मेले की शुरुआत मुगल बादशाह औरंगजेब ने की थी। यहां उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के सैकड़ों व्यापारी हजारों गधे लेकर पहुंचते हैं और उनका व्यापार करते हैं। वहीं इस वर्ष कोरोना के प्रकोप के चलते तीर्थ यात्रियों की आवक कम होने से धंधा मंदा रहने की आशंका है। इसके अलावा कुछ व्यापारियों का मानना है कि मशीनरी का अधिक उपयोग होने एवं वैश्विक मंदी के चलते पशु धन के कारोबार में भारी गिरावट आई है। ऐतिहासिक मेला होने के बावजूद दूर दराज से आने वाले गधे व्यापारियों के लिए मध्य प्रदेश प्रशासन द्वारा सुविधाएं उपलब्ध न कराये जाने से भी नाराजगी दिखायी दे रही है।

CHITRAKOOT GADHE MELE

सबसे बड़ी दिलचस्प बात यह है कि चित्रकूट में प्रति वर्ष लगने वाले दीपदान मेले में एक ओर धर्म और आध्यात्म से जुडा ऐतिहासिक कार्यक्रम होता है। वहीं दूसरी ओर इस अवसर पर यहां लगने वाला गधा मेला भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय रहता है। इस मेले में कई प्रदेशों से हजारों की संख्या में आये विभिन्न नस्लों के गधों की खरीद-फरोख्त बड़े पैमाने से होती है। पांच दिवसीय दीपावली मेले के दौरान चित्रकूट गधों के कारोबार का बड़ा केंद्र बना रहता है। इस मेले में विभिन्न कद काठियों के गधों को देखने के लिए लोगों की खासी भीड़ जुटती है। चित्रकूट में लगने वाला यह गधा मेला व्यापार करने वालों के लिए मुनाफा कमाने का अवसर लेकर आता है।

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गधा मेले के आयोजक बग्गड पांडेय ने बताया कि इस गधे मेले की परम्परा मुगल बादशाह औरंगजेब ने शुरू की थी। मूर्ति भंजक औरंगजेब ने चित्रकूट के इसी मेले से अपनी सेना के बेड़े में गधो और खच्चरों को शामिल किया था। इसलिए इस मेले का ऐतिहासिक महत्व है। बताया कि मंदाकिनी तट पर लगने वाले गधे मेले में बिकने के लिए विभिन्न प्रदेशों से लगभग पांच हजार गधे, घोड़े और खच्चर आये हुए है। कोरोना के ग्रहण से इस बार गधे,घोड़े तथा खच्चर की बिक्री फीकी नजर आ रहीं है। फिलहाल सदियों से चली आ रही यह परम्परा अब धीरे-धीरे टूटती नजर आ रही है।

शंकरगढ़ के व्यापारी इरफान अली एवं रींवा के व्यापारी जियाउल खान का कहना है कि तीन दिवसीय गधा मेले में सुरक्षा के नाम पर कोई इंतजाम नहीं किया जाता। व्यापारियों के गधे बिके या न बिके पर ठेकेदार को तो इन्हें प्रति गधा 100 रूपए खूंटा का तो देना ही पड़ता है। इसके अजावा एक गट्ठा घास का 400 रूपये और बिकने पर ठेकेदार द्वारा 500 रूपये वसूल लिया जाता है। इसके बावजूद मेला में सुविधा के नाम पर इन्हें सिर्फ गंदगी ही मिल पाती है। ऐसी दशा में यह ऐतिहासिक गधा मेला हर साल सिमटता जा रहा है।

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