उत्तराखंड में फिर मंडराया चमोली जैसी महातबाही का खतरा! वैज्ञानिकों ने 'हैंगिंग ग्लेशियर' पर दी बेहद डराने वाली चेतावनी
साल 2021 का वह मनहूस दिन शायद ही कोई भूल पाया होगा, जब उत्तराखंड के चमोली जिले में अचानक कुदरत का ऐसा कहर टूटा जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। पहाड़ की गगनचुंबी ऊंचाइयों से बर्फ, चट्टान और मलबे का एक विशालकाय हिस्सा टूटकर सीधे नीचे आ गिरा था। इसके बाद महज कुछ ही मिनटों के भीतर ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में वो खौफनाक मंजर देखने को मिला, जिसने सैकड़ों हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया और करोड़ों रुपये के बड़े प्रोजेक्ट्स मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। आज एक बार फिर उसी भयावह त्रासदी की चर्चा चारों तरफ तेज हो गई है। वजह है वैज्ञानिकों द्वारा हिमालय को लेकर जारी की गई एक नई और बेहद गंभीर चेतावनी। वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण उत्तराखंड के पहाड़ों पर टिके 'हैंगिंग ग्लेशियर' (Hanging Glaciers) तेजी से अस्थिर हो रहे हैं, जो आने वाले समय में किसी बड़ी आपदा का सबब बन सकते हैं।
आखिर क्या होते हैं ये 'हैंगिंग ग्लेशियर' और क्यों माना जाता है इन्हें टाइम बम
आम लोगों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि सामान्य ग्लेशियर और हैंगिंग ग्लेशियर में क्या अंतर होता है। दरअसल, हैंगिंग ग्लेशियर उन बर्फ के पहाड़ों को कहा जाता है जो किसी सीधी खड़ी ढलान या ऊंची चट्टानों के किनारों पर बेहद खतरनाक तरीके से लटके हुए होते हैं। आम तौर पर जो घाटी वाले ग्लेशियर होते हैं, उनका आधार समतल और मजबूत होता है, लेकिन इसके विपरीत हैंगिंग ग्लेशियरों का आधार बेहद कमजोर और अस्थिर होता है। इसी वजह से बढ़ते तापमान के कारण इनमें बहुत जल्दी गहरी दरारें पड़ जाती हैं और इनका कोई भी भारी हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर जाता है। जब ये ग्लेशियर टूटते हैं, तो अपने साथ लाखों टन बर्फ, नुकीले पत्थर और मलबे का ऐसा तूफानी सैलाब लाते हैं जो रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर देता है। इसकी वजह से हिमस्खलन (Avalanche), मलबे का तेज बहाव और अचानक भीषण बाढ़ (Flash Floods) जैसी आपदाएं आती हैं।
धरती का बढ़ा तापमान: कंक्रीट का जाल और इंसानी लालच ने बिगाड़ा खेल
अगर हम इस खतरे की असली जड़ को समझें तो वह है जलवायु परिवर्तन। संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट के मुताबिक, 1800 के दशक के बाद से इंसानी गतिविधियों, जैसे- कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के बेतहाशा इस्तेमाल ने धरती के पर्यावरण को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है। इनसे निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी जहरीली ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी के वायुमंडल के चारों तरफ एक ऐसा घेरा बना लेती हैं जो सूरज की गर्मी को बाहर नहीं जाने देता। इसी का नतीजा है कि आज पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के दौर से पहले की तुलना में करीब 1.44 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। डेटा बताते हैं कि साल 2015 से 2024 तक का दशक इतिहास का सबसे गर्म दशक रहा है। इसी बढ़ती तपिश ने अब देवभूमि उत्तराखंड के शांत और ठंडे ग्लेशियरों को भीतर से खोखला करना शुरू कर दिया है।
अलकनंदा बेसिन में शोधकर्ताओं ने ढूंढ निकाले सैकड़ों खतरनाक ग्लेशियर
बढ़ते वैश्विक तापमान का सबसे बुरा असर हिमालयी क्षेत्र पर देखने को मिल रहा है। गर्मी की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघलकर पीछे खिसक रहे हैं, जिससे उनकी आंतरिक संरचना और पकड़ कमजोर हो रही है। इस गंभीर स्थिति को भांपते हुए भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), डीआरडीओ (DRDO) और आईआईटी (IIT) भुवनेश्वर के शीर्ष वैज्ञानिकों ने एक साझा रिसर्च किया है। इस स्टडी में मध्य हिमालय क्षेत्र, विशेष रूप से अलकनंदा बेसिन में सैकड़ों ऐसे संभावित अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है जो कभी भी टूट सकते हैं। बता दें कि अलकनंदा बेसिन वही इलाका है, जहां अतीत में भी कई विनाशकारी जलप्रलय देखने को मिल चुके हैं।
चमोली का सबक: झीलों के फटने से आ सकती है 'ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड'
2021 की चमोली आपदा में 200 से अधिक लोगों की जान चली गई थी या वे हमेशा के लिए लापता हो गए थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो ऐसी घटनाओं की आवृत्ति और बढ़ जाएगी। इन लटके हुए ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों के ऊपर अस्थाई कृत्रिम झीलें बन जाती हैं। जब इन झीलों में पानी का दबाव क्षमता से अधिक हो जाता है, तो ये अचानक फट जाती हैं। विज्ञान की भाषा में इसे 'ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) कहा जाता है। यह बाढ़ इतनी विनाशकारी होती है कि पहाड़ से नीचे बसे गांवों और कस्बों को संभलने का एक सेकंड का मौका भी नहीं मिलता।
उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती: विकास और विनाश के बीच संतुलन की जरूरत
भू-वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने उत्तराखंड सरकार और नीति निर्माताओं को चेतावनी दी है कि हिमालयी क्षेत्रों में चल रहे भारी निर्माण कार्यों पर तुरंत आत्ममंथन करने की जरूरत है। पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही सड़कें, सुरंगे (टनल) और जलविद्युत परियोजनाओं (Hydroelectric Projects) की रूपरेखा बेहद संवेदनशीलता के साथ तैयार की जानी चाहिए। ग्लेशियरों के ठीक नीचे मौजूद संवेदनशील घाटियों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों में बिना सोचे-समझे किया गया कंक्रीट का निर्माण भविष्य में खुद मौत को दावत देने जैसा है। हाल ही में कंचन गंगा क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने की जो घटना हुई थी, वह भले ही किसी बड़े नुकसान के बिना टल गई हो, लेकिन वह प्रकृति की तरफ से एक आखिरी चेतावनी थी। वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि अब समय सिर्फ सैटेलाइट से ग्लेशियरों की निगरानी करने का नहीं है, बल्कि बदलती जलवायु के खतरनाक दौर में सुरक्षित तरीके से जीवित रहने के लिए एक सख्त और ठोस नीति बनाने का है।