बहुत ही अनोखी है 2500 साल पुराने इस पेड़ की कहानी, जिसके नीचे भगवान बुद्ध को मिला था ‘दिव्य ज्ञान’

नई दिल्ली: भगवान बुद्ध को कौन नहीं जानता है. वह एक ऐसे महात्मा थे जिन्होंने अहिंसा और करुणा के माध्यम से पूरी दुनिया को शांति और सद्भाव का संदेश दिया। आपको जानकर हैरानी होगी कि उनका जन्म वैशाख पूर्णिमा के दिन लुंबिनी में सिद्धार्थ के रूप में हुआ था और इसी दिन वे बोधगया में ज्ञान प्राप्त कर भगवान बुद्ध बने थे और इसी दिन कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण भी हुआ था। भगवान बुद्ध को बोधगया में महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल के पेड़ के नीचे 531 ईसा पूर्व में ज्ञान प्राप्त हुआ था, जिसे बोधि वृक्ष कहा जाता है। यह पेड़ 2500 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है, जिसकी कहानी बहुत ही अनोखी और दिलचस्प है।

शायद ही आप जानते हों कि बोधि वृक्ष को दो बार नष्ट करने का प्रयास किया गया था, लेकिन चमत्कारिक रूप से यह पेड़ हर बार बढ़ता गया और दुनिया को हैरान कर देता था। कहा जाता है कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में पहली बार बोधि वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास किया गया था। ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोक की रानी तिशिरक्षित ने इस पेड़ को गुपचुप तरीके से काट दिया था, लेकिन चमत्कार देखिए कि कुछ ही वर्षों में इसकी जड़ से एक नया पेड़ उग आया, जिसे दूसरी पीढ़ी का पेड़ कहा गया।

यह पेड़ है ‘चमत्कार’
दूसरी पीढ़ी का यह पेड़ लगभग 800 साल तक जीवित रहा। इसके बाद सातवीं शताब्दी में बंगाल के राजा शशांक ने भी बोधिवृक्ष को नष्ट करने का प्रयास किया। उसने पेड़ को काटकर उसकी जड़ों को जला दिया, लेकिन फिर भी वह पेड़ नष्ट नहीं हुआ और कुछ ही वर्षों में उसकी जड़ों से एक नया पेड़ निकल आया, जिसे तीसरी पीढ़ी का पेड़ कहा गया। यह वृक्ष भी लगभग 1250 वर्षों तक जीवित रहा।

श्रीलंका में भी है ‘बोधि वृक्ष’
फिर वर्ष 1876 में एक प्राकृतिक आपदा में इस पेड़ को भारी क्षति हुई और यह नष्ट हो गया, जिसके बाद लॉर्ड कनिंघम नाम के एक अंग्रेज ने श्रीलंका के अनुराधापुरा से बोधि वृक्ष की एक शाखा प्राप्त की और इसे बोधगया में स्थापित कर दिया। इसे बोधि वृक्ष की पीढ़ी का चौथा वृक्ष कहा जाता है, जो आज भी मौजूद है।

अब आप सोच रहे होंगे कि बोधि वृक्ष श्रीलंका कैसे पहुंचा, तो हम आपको बता दें कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के पुत्र और पुत्री बौद्ध धर्म का प्रचार करने श्रीलंका गए थे, फिर बोधि वृक्ष को अपने साथ ले गए। एक शाखा भी ली गई, जिसे अनुराधापुरा में स्थापित किया गया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह पेड़ आज भी वहां मौजूद है।