जब 18 महीने तक लोग धरती से नहीं देख पाए थे आसमान, चारों तरफ थी बस धुंध ही धुंध

नई दिल्ली: साल 1918 में स्पैनिश फ्लू के कारण पूरी दुनिया में महामारी फैली थी. हर तरफ से बस लोगों के मरने की खबरें आ रही थी. ऐसा कोई देश नहीं था, जहां लोगों ने अपनी जान नहीं गवाई थी. आंकड़ों के मानें तो उस दौरान करीब 5 करोड़ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. उस दौरान लोग किसी से मिलने से भी करताते थे. कई लोग तो कई महीनों तक अपने घरों में ही रहते थे.

साल 1918 के बाद से दुनिया ऐसी किसी महामारी का शिकार नहीं हुई थी. लेकिन 2020 भी कुछ ऐसा ही रहा. साल 2020 में कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनिया के अधिकांश देशों में लॉकडाउन रहा. लोग कई सप्ताह कर अपने घरों में ही कैद रहे. कोरोना के कारण दुनिया में अभी तक 7 करोड़ से अधिक लोग संक्रमित चुके हैं, करीब 16 लाख से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.

पूरी दुनिया ऐसे में यह सोच रही है कि जल्दी से यह साल खत्म हो और उसके साथ बुरा वक्त भी खत्म हो. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी धरती पर इंसानों को अभी सबसे बुरा वक्त देखना बाकी है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि हमसे पहले यह धरती काफी बुरा वक्त भी देख चुकी है. इस धरती पर एक समय ऐसा भी आया था जब इंसान एक दो दिन या एक सप्ताह या फिर एक दो महीने नहीं बल्कि करीब 18 महीने तक जमीन से साफ आसमान नहीं देख पाए थे.

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, हार्वर्ड के मध्यकालीन इतिहासकार और पुरातत्वविद् माइकल मैककॉर्मिक ने बताया कि साल 536 ईस्वी में रहस्यमयी धुंध ने धरती के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया था और इसके कारण करीब 18 महीनों तक लोग साफ आसमान नहीं देख पाए थे. कई लोगों को मानना है कि वब सबसे बुरा दौर था. उस दौरान हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी.

हिस्ट्री.कॉम की रिपोर्ट के अनुसार, उस दौरान धुंध के कारण धरती का तापमान गिर गया था, क्योंकि सूर्य़ कि किरणें धरती पर नहीं आ पा रही थी. बीजान्टिन इतिहासकार प्रोकोपियस ने लिखा है कि उस दौरान सूरज चमकता तो था, लेकिन उसकी तपिश का एहसास नहीं होता था. सूर्य उस दौरान किसी पूर्णिमा की रात में चमकते चांद की तरह होता था, जिसमें रोशनी तो होती लेकिन शीतलता भी रहती.

दावा किया जाता है कि उस दौरान गर्मियों में अधिकतम तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक रहा था. कहा जाता है कि यह पिछले 2300 वर्षों में सबसे ठंडा दशक था. कुछ इतिहासकारों का दावा है कि उस साल चीन में गर्मियों में बर्फ गिरी थी. दावा किया जाता है फसलें खराब हो गई थीं और लोग भूख से मरने लगे थे.

आयरिश क्रॉनिकल का रिकॉर्ड में दर्शाया गया है कि साल 536 से 539 रोटी की विफलता का साल था. साल 536 में जो भी हुआ वो उसका असर लंबे समय तक उत्तरी गोलार्ध पर रहा था. कई शताब्दियों तक वैज्ञानिकों ने इसको गंभरीता से नहीं लिया था और किसी को पता भी नहीं था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ था. लेकिन 1990 के बाद इसे गंभीरता से लिया गया.

साल 536 में क्या हुआ था, इसको लेकर हुए एक शोध में दावा किया गया कि संभवत: उस दौरान उत्तीर अमेरिका या आइसलैंड में कोई बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट हुआ होगा और इसके बाद राख और धुंआ पूरे उत्तीर गोलार्ध में फैला होगा, जिसके कारण दुनिया ने यह दर्दनाक पल देखा था. माना जाता है कि ठंठी हवाओं के कारण यह धुंआ पूरे उत्तरी गोलार्ध में फैला था.