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आज हम महर्षि भृगु के जीवन काल से जुड़ी एक ऐसे घटना का वर्णन करने जा रहे हैं... जब उन्होने भगवान विष्णु की छाती पर अपने पैरों से प्रहार कर दिया था... क्यो उन्हे इतना घोर पाप करना पड़ा...हम आपको बताएंगे... कई शास्त्रों में इस घटनाक्रम का बड़ी ही खूबसूरती के साथ उल्लेख किया गया है.... कहते हैं कि, एक बार भृगु ऋषि और अन्य मुनियों ने मिलकर यज्ञ का आयोजन किया... इस यज्ञ में नारद जी भी पधारे थे... नारद जी ने ऋषियों से पूछा कि आप लोग इस यज्ञ का फल किसे देना चाहेंगे... इस पर ऋषियों का जवाब था कि, तीनों देवों में सबसे श्रेष्ठ देव को ही इस यज्ञ का फल दिया जाएगा... लेकिन समस्या यह थी कि, ब्रम्हा, विष्णु और महेश में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं... इसका निर्धारण कैसे किया जाए.. और इसका कोई निष्कर्ष ना निकलता देख कर उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया... महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए... उन्होंने ब्रह्माजी को ना तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की... ये देख कर ब्रह्माजी क्रोधित हो गए... क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया... लेकिन फिर यह सोचकर कि, ये उनके पुत्र हैं... उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक- बुद्धि में दबा लिया... जिसके बाद महर्षि भृगु वहाँ से कैलाश चले गए.. वहां देवाधिदेव भगवान शिव ने देखा कि, भृगु आ रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए भुजाएँ फैला दीं... किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले- महादेव आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं... दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं... उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है... इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि नहीं करूँगा... उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे... और उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा वैसे ही भगवती सती ने अनुनय- विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया... इसके बाद भृगु मुनि वैकुण्ठ लोक को गए भगवान विष्णु की परिक्षा लेने के लिए... उस समय भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी की गोद में सिर रखकर लेटे हुए थे... भृगु मुनि ने जाते ही उनके वक्ष पर एक तेज लात मारी.. भक्त- वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले- भगवन आपके पैर पर चोट तो नहीं लगी.... कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए... और साथ ही भगवान विष्णु ने कहा कि, भगवन मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान नही था.. इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका.. आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है.. आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया... भगवान विष्णु का ये प्रेम- व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आँखों से आँसू बहने लगे... और इस घटना के बाद ऋषि ने तीनो देवो से माफी मांगी.. और तीनो देवो को इस संबंध से जुड़ा वृतांत बताया.. उसके बाद वे ऋषि- मुनियों के आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु के यहाँ के सभी अनुभव को विस्तार से बताया.. उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए.. तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे