फर्जी आदेश पर नौकरी पाने वाले भ्रष्ट ऑफिसर मयंक श्रीवास्तव को CEO ग्रेटर नोएडा ने क्यों दिया इंडस्ट्री का प्रभार, पढ़िए खबर 

लखनऊ।। सरकार किसी की भी हो दावा यही किया जाता रहा है कि ‘कानून से ऊपर कोई नहीं ” लेकिन उत्तर प्रदेश का एक ऐसा भी ऑफिसर है जिसकी पूरी नौकरी में ही झोल है। झोल इस ऑफिसर की नौकरी में ही नहीं बल्कि अब तक की उसकी नौकरी ही झोल से पटी पड़ी है। चूँकि वो ऑफिसर एक आईएएस का सुपुत्र है इसलिए यहाँ तैनात होने वाला वो चाहे प्रबंध निदेशक हो या शासन स्तर पर कोई प्रमुख सचिव, सबके दिल में एक नरम कोना जो है।

मयंक श्रीवास्तव जो कि उत्तर प्रदेश में विशेष सचिव गृह रहे एक नौकरशाह का बेटा है, को निगम मुख्यालय कानपुर से ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में तैनात किया गया है। पूर्व में मयंक श्रीवास्तव upsidc में ग्रेटर नॉएडा और गाज़ियाबाद के क्षेत्रीय प्रबंधक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित कर चुका है।

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मयंक श्रीवास्तव के यूपीएसआईडीसी में नौकरी हासिल करने की कहानी भी अजीब है। शासन के एक फर्जी आदेश पर नौकरी हासिल की और ताल ठोंक कर खुलेआम भ्रष्टाचार करने के बाद भी ग्रेटर नोएडा ऑथोरिटी में तैनाती हासिल करने के बाद भ्रष्ट अधिकारी मयंक श्रीवास्तव ने अपने रसूख और लेन-देन के चलते इंडस्ट्री का काम भी अलॉट करवा लिया।

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सूत्रों की मानें तो ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में तैनाती पाने वाले मयंक श्रीवास्तव ने शासन-सत्ता से दबाव डलवाकर CEO ग्रेटर नोएडा नरेंद्र भूषण को मजबूर करते हुए इंडस्ट्री का प्रभार ले लिया जबकि सीईओ उसे इस महत्वपूर्ण प्रभार को देने के पक्ष में नहीं थे।

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बता दें कि मयंक श्रीवास्तव यूपीएसआईडीसी के अफसरों में वो जाना माना नाम है जिसने यूपीएसआईडीसी( UPSIDC अब UPSIDA) में भ्रष्टाचार को स्थापित किया। शासन-प्रशासन भले ही लाख दावे करे की नियम-कानून सबके लिये बराबर होता है लेकिन ये नियम-कानून तब धरा का धरा रह जाता है जब मयंक श्रीवास्तव जैसे भ्रष्ट ऑफिसर की बात आती है।

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हालाँकि वैसे तो UPSIDC(अब UPSIDA) भ्रष्टाचार को लेकर अक्सर सुर्ख़ियों में रहता है। आज हम बताने जा रहे हैं कि कैसे UPSIDC में शासन के फर्जी आदेश और किस तरह से बिना विज्ञापन के नियम-कानून को ताक पर रखकर नियुक्तियां की जाती हैं।जानकारी के मुताबिक बिना विज्ञापन भर्तियों की UPSIDC (अब UPSIDA) में शुरुआत सर्वप्रथम तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक राजीव कुमार द्वारा की गई। उन्होंने मयंक श्रीवास्ताव की बिना विज्ञापन नियुक्ति करके इस परम्परा की शुरुआत की। मयंक की नियुक्ति मैनेजमेंट ट्रेनी के रुप में 1991 में 2500 रुपये प्रतिमाह पर कर दी गई।

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जबकि महामुहिम राज्यपाल के द्वारा UPSIDC (अब UPSIDA) के स्वीकृत स्टाफ स्टैण्ड में मैनेजमेनट ट्रेनी का कोई भी पद सृजित ही नहीं है। इतना ही नहीं इस नियमविरुद्ध की गयी नियुक्ति को शासन के दबाव में उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास निगम के सर्विस रूल का उल्लंघन करते हुये मयंक श्रीवास्तव को निदेशक मंडल की बैठक में उप-प्रबन्ध के पद पर नियुक्ति दे दी गयी।

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जबकि सर्विस रूल के मुताबिक लागू सेवा नियमावली ये कहती है कि, उप प्रबन्ध (सामान्य) का पद 50 प्रतिशत सीधी भर्ती से और 50 प्रतीशत प्रमोशन से भरे जाने वाला पद है। उप-प्रबंधक (सामान्य) के पद पर मृतक आश्रित के रूप में किसी प्रकार की नियुक्ति नहीं की जा सकती। इसके उपरान्त भी नियम-कानून को ताक पर रखकर निदेशक मंडल की बैठक में इस प्रस्ताव को पास करवाकर मयंक श्रीवास्तव की नियुक्ति कर दी गई।

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नियुक्ति के बाद मयंक श्रीवास्तव ने क्षेत्रिय प्रबन्धक गाजियाबाद में डिप्टी मैनेजर पद पर कार्य करते हुये उन भू-खंडों का आवंटन कर दिया जो भूखंड आज भी UPSIDC के कब्जे में नहीं है। जिसकी जांच आज भी निरंतर चल ही रही है। इस प्रकरण में इन्हें तत्कालीन यूपीएसडीसी प्रबन्ध निदेशक द्वारा निलंबित किया गया।

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सूत्रों की मानें तो निलंबन के साथ-साथ 76 भूखंडों के फर्जी आवंटन के लिए मयंक श्रीवास्तव पर FIR करने के आदेश भी दिये गये लेकिन मामले को दबा दिया गया और यहाँ तक कि FIR भी दर्ज नहीं हुई। बाद में पुनः इन्हें बहाल कर दिया गया। बहाली के बाद मयंक श्रीवास्तव की फिर से महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती दी जाने लगी और पूर्व की भांति निगम में भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान बनाने में जुट गये।मयंक के विरुद्ध फाइलों में जाँच चलती रही, कोई कार्रवाई तो नहीं हुई उलटे मयंक को निदेशक मंडल की बैठक के द्वारा डिप्टी मैनेजर का अवार्ड जरूर दे दिया गया गया।

मयंक श्रीवास्तव की यूपीएसआईडीसी(अब UPSIDA) में नियुक्ति को लेकर एक बड़ा झोल है। मयंक श्रीवास्तव की नियुक्ति मृतक आश्रित में बताई जाती है जबकि मयंक श्रीवास्तव के पिता कभी UPSIDC में रहे ही नहीं। उनकी मृत्यु जब हुई तब उनकी तैनाती बतौर विशेष सचिव गृह शासन में थी। इतना ही नहीं वो कभी औद्योगिक विकास विभाग में नहीं रहे।

मयंक श्रीवास्तव की नियुक्ति को लेकर जो जानकारी सामने आयी है वो भी बेहद चौंकाने वाली है। निगम सूत्रों की मानें तो मयंक श्रीवास्तव की नियुक्ति शासन के तथाकथित एक फर्जी आदेश के क्रम में हुई थी जिसकी पुष्टि शासन ने कभी भी नहीं की और न ही इसका कोई अभिलेख शासन में उपलब्ध है। यहीं नहीं मयंक की नियुक्ति के बाद उसे सीधे डिप्टी मैनेजर के पद पर कर दी गयी जबकि डिप्टी मैनेजर के पद पर सीधे नियुक्ति का कोई प्राविधान ही नहीं है।

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