22 साल का सूखा रिकॉर्ड: 40% कम बारिश से मचा हाहाकार, अब 'सन-डिमिंग' के जरिए अल-नीनो को मात देने की तैयारी
दुनिया भर में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। इस साल मानसून ने पिछले 22 सालों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए सामान्य से 40% कम बारिश दर्ज की है, जिससे खेती-किसानी और जल संकट ने विकराल रूप ले लिया है। इस असामान्य सूखे और बढ़ते तापमान के पीछे 'अल-नीनो' (El Nino) को मुख्य कारण माना जा रहा है। अब वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय ने इस आपदा से निपटने के लिए एक विवादास्पद लेकिन क्रांतिकारी तकनीक पर चर्चा शुरू कर दी है, जिसे 'सन-डिमिंग' (Sun-dimming) या सौर जियोइंजीनियरिंग कहा जा रहा है।
क्या है 40% बारिश की कमी का संकट?
पिछले दो दशकों में पहली बार मानसून का इतना कमजोर होना ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर परिणामों की ओर इशारा करता है। बारिश की कमी के कारण जलाशयों का जलस्तर न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है, जिससे बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल-नीनो के सक्रिय होने से प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ गया है, जिसने मानसून की हवाओं के पैटर्न को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।
क्या है 'सन-डिमिंग' (Sun-dimming) तकनीक?
अब वैज्ञानिकों की नजर 'सोलर रेडिएशन मॉडिफिकेशन' यानी 'सन-डिमिंग' पर है। इस तकनीक के तहत पृथ्वी के वायुमंडल में (स्ट्रैटोस्फीयर में) विशेष प्रकार के एरोसोल या परावर्तक कणों का छिड़काव किया जाएगा। ये कण सूरज की हानिकारक रोशनी और गर्मी के एक हिस्से को अंतरिक्ष में वापस परावर्तित (Reflect) कर देंगे। इससे पृथ्वी का औसत तापमान कम होगा, जिससे अल-नीनो की तीव्रता को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है और मानसून का पैटर्न वापस पटरी पर आ सकता है।
क्यों है विवाद और क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि 'सन-डिमिंग' सुनने में एक जादुई समाधान लग रहा है, लेकिन इसके गंभीर जोखिम भी हैं। दुनिया भर के पर्यावरणविदों का तर्क है कि वायुमंडल के साथ छेड़छाड़ करने से मानसून की पूरी व्यवस्था बिगड़ सकती है, जिससे कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश तो कुछ में भयंकर सूखा पड़ सकता है। इसके अलावा, ओजोन परत पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर भी वैज्ञानिक आशंकित हैं। आलोचकों का कहना है कि यह तकनीक ग्लोबल वार्मिंग की जड़—यानी कार्बन उत्सर्जन—को कम करने के बजाय केवल एक 'शॉर्टकट' प्रदान करती है।
भविष्य का क्या है रास्ता?
फिलहाल यह तकनीक केवल एक वैज्ञानिक सिद्धांत के रूप में चर्चा में है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू करने से पहले सख्त कानूनों और वैश्विक सहमति की जरूरत है। भारत जैसे देशों के लिए, जहाँ मानसून की स्थिति सीधे तौर पर जीडीपी और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करती है, यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकारें इस दिशा में क्या कदम उठाती हैं। फिलहाल, सूखे से निपटने के लिए सरकारें जल संरक्षण और पारंपरिक उपायों पर ही जोर दे रही हैं, लेकिन 'सन-डिमिंग' पर हो रही यह बहस आने वाले समय में एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है।