Up Kiran, Digital Desk: बागेश्वर जनपद के दूरस्थ धारी-डोबा गांव के पास स्थित एक प्राचीन गुफा इन दिनों न सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बल्कि प्रकृति के रहस्यों के मामले में भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। यह गुफा न केवल श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है, बल्कि अपने अद्वितीय प्राकृतिक स्वरूप और गूढ़ आकृतियों के कारण पर्यटकों को भी अपनी ओर खींचती है। ग्रामीणों का मानना है कि इस गुफा को धार्मिक धरोहर का दर्जा मिलना चाहिए ताकि इसकी सुरक्षा और संरक्षण हो सके।
ग्रामवासियों के अनुसार, गुफा से जुड़ी कई लोककथाएँ और किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। यहाँ के निवासी हर सिंह का कहना है कि उनके पूर्वजों ने बताया था कि यह गुफा बहुत पुरानी है, और यह सतयुग से जुड़ी हुई मानी जाती है। कुछ लोग इसे एक भूगर्भीय घटना के रूप में देख रहे हैं, जबकि कई अन्य इसे बाबा की तपस्या से जुड़ा हुआ स्थल मानते हैं। उनक कहना है कि यहाँ तपस्या करने के बाद ही पत्थरों से दूध की धाराएँ बहने लगीं।
धार्मिक आस्थावादी संत देवेंद्र गिरी इस गुफा को केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि ध्यान और साधना का भी स्थान मानते हैं। उनका कहना है कि यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत और पवित्र है, जो किसी भी साधक के लिए उपयुक्त है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, विशेषज्ञों का मानना है कि यहाँ पर पाए जाने वाले कैल्सियम और चूना पत्थर के जल से प्रतिक्रियाओं के कारण यह सफेद धाराएँ निकल सकती हैं।
ग्रामवासियों का आरोप है कि उन्होंने कई बार प्रशासन से इस गुफा के संरक्षण की अपील की है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। गाँव के निवासी दयाल पांडे ने गुफा को धार्मिक धरोहर के रूप में घोषित करने की मांग की है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस अनोखी धरोहर का अनुभव हो सके।
गुफा के अंदर प्रवेश करते ही, एक ठंडी हवा का झोंका और दीवारों पर उकेरी गई प्राकृतिक आकृतियाँ श्रद्धालुओं और पर्यटकों को एक अद्भुत अनुभव कराती हैं। गुफा के अंदर जाने पर संकरे मार्गों से होते हुए एक विशाल गुंबदाकार हॉल में पहुँचते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, गुफा के भीतर स्थित शिवलिंगों से दूध जैसी सफेद धाराएँ निरंतर बहती रहती हैं। इस चमत्कारी दृश्य को देखने के लिए आसपास के गांवों से लोग रोज़ यहाँ पहुंचते हैं।




