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Up kiran,Digital Desk : स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर जारी गतिरोध ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां से केवल युद्ध की आहट सुनाई दे रही है। ईरान द्वारा होर्मुज को खोलने के संकेत देने के बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'नौसैनिक नाकेबंदी' (Naval Blockade) जारी रखने का ऐलान कर आग में घी डालने का काम किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के पास इस संकट को सुलझाने के तीन अन्य स्पष्ट रास्ते थे, लेकिन अपनी 'साख' और 'दबाव की राजनीति' के चलते उन्होंने सबसे जोखिम भरा विकल्प चुना।

ट्रंप के पास मौजूद थे ये 3 विकल्प

विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका अगर चाहता तो नाकेबंदी के बजाय इन रास्तों पर चल सकता था:

शांतिपूर्ण कूटनीति: बातचीत के जरिए एक ऐसा 'मिडल ग्राउंड' तैयार करना, जिससे ईरान अपनी शर्तों पर ढील देता और बदले में अमेरिका प्रतिबंधों में रियायत देता। यह सबसे सुरक्षित रास्ता था।

यथास्थिति (Status Quo) की बहाली: युद्ध से पहले वाली स्थिति को वापस लाना। यानी अमेरिका अपनी आक्रामकता कम करता और ईरान समुद्री व्यापार को सुचारू रहने देता। इससे वैश्विक तेल बाजार को तुरंत राहत मिलती।

पूर्ण सैन्य प्रहार: तीसरा और सबसे आक्रामक रास्ता था ईरान के 'ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर' को नष्ट करना और खर्ग द्वीप पर कब्जा कर लेना। इससे होर्मुज तो खुल जाता, लेकिन ईरान के साथ पूर्ण युद्ध शुरू हो जाता और शांति की संभावनाएं दशकों के लिए खत्म हो जातीं।

अमेरिका ने 'नाकेबंदी' की जिद क्यों पकड़ी?

इतने विकल्पों के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने नेवल ब्लॉकैड को ही चुना। इसके पीछे की रणनीतिक वजहें कुछ इस प्रकार हैं:

साख का सवाल: ट्रंप नहीं चाहते कि वैश्विक मंच पर यह संदेश जाए कि ईरान की धमकियों के आगे महाशक्ति अमेरिका को झुकना पड़ा। अपनी 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' वाली छवि को बचाने के लिए वे टकराव का रास्ता चुन रहे हैं।

अकेलापन और 'नेटो' की बेरुखी: इस युद्ध में अमेरिका को वह वैश्विक समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी। नेटो (NATO) सहयोगी और एशियाई देशों ने भी इस जंग से दूरी बना ली है। ऐसे में नाकेबंदी ही उसे ईरान को झुकाने का सबसे सस्ता और प्रभावी हथियार नजर आ रहा है।

ईरान की आर्थिक कमर तोड़ना: अमेरिका का मानना है कि अगर ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी जारी रही, तो विदेशी मुद्रा की कमी और घरेलू दबाव के चलते तेहरान घुटने टेक देगा और अमेरिका की शर्तों पर 'नई न्यूक्लियर डील' के लिए राजी हो जाएगा।

दोधारी तलवार है यह रणनीति

अमेरिका की यह जिद केवल ईरान को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को चोट पहुंचा रही है:

वैश्विक अर्थव्यवस्था: होर्मुज बंद होने से कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है।

सप्लाई चेन संकट: खाड़ी देशों का व्यापार और लॉजिस्टिक्स बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

खाड़ी देशों की चुप्पी: ट्रंप को उम्मीद थी कि नुकसान होने पर खाड़ी देश ईरान के खिलाफ अमेरिका के साथ आएंगे, लेकिन फिलहाल अधिकतर देश इस विवाद में 'न्यूट्रल' रहना पसंद कर रहे हैं।