Up Kiran,Digital Desk: हिंदू धर्म में जीवन के प्रत्येक चरण को एक उद्देश्यपूर्ण यात्रा के रूप में देखा गया है। इसमें चार आश्रमों का सिद्धांत व्यक्तित्व के भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यह व्यवस्था न केवल व्यक्ति की आंतरिक यात्रा को दिशा देती है, बल्कि समाज और परिवार के प्रति उसके कर्तव्यों को भी संतुलित करती है। इन चार आश्रमों में बारी-बारी से प्रवेश करने का उद्देश्य जीवन को एक क्रमबद्ध, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण दिशा में ले जाना है।
1. ब्रह्मचर्य आश्रम – शिक्षा और आत्म-नियंत्रण का समय
ब्रह्मचर्य आश्रम जीवन का प्रारंभिक दौर होता है, जो युवा अवस्था के पहले 25 वर्षों को संदर्भित करता है। इस चरण में व्यक्ति की प्राथमिकता शिक्षा और आत्म-नियंत्रण होती है। यह समय ज्ञान अर्जन, चरित्र निर्माण और मानसिक-शारीरिक विकास का है। बच्चों और युवाओं को इस समय में न केवल किताबों से ज्ञान मिलता है, बल्कि वे अपनी इच्छाओं और वासनाओं पर नियंत्रण पाना भी सीखते हैं। यह इस बात का आधार है कि जीवन के बाकी पहलुओं को सही दिशा में कैसे मोड़ा जाए।
2. गृहस्थ आश्रम – जिम्मेदारियों का दौर
गृहस्थ आश्रम वह समय है, जब व्यक्ति 25 से 50 वर्ष की आयु में विवाह करता है और परिवार व समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में व्यस्त हो जाता है। इस चरण में व्यक्ति के जीवन का प्रमुख उद्देश्य परिवार का पालन-पोषण करना, सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करना और धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करना होता है। यह वह समय होता है, जब व्यक्ति जीवन के भौतिक पहलुओं को भी समझता है, जैसे धन अर्जन और गृहस्थी के संचालन के तरीके। इस दौरान मनुष्य सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होता है।
3. वानप्रस्थ आश्रम – सांसारिक मोह से मुक्ति का समय
वानप्रस्थ आश्रम वह समय है, जब व्यक्ति 50 वर्ष की उम्र के बाद सांसारिक जीवन से कुछ हद तक विरक्त हो जाता है और आत्म-चिंतन तथा भक्ति में ध्यान केंद्रित करता है। यह वह दौर होता है, जब व्यक्ति समाज में सक्रिय भागीदारी के बजाय, ईश्वर की भक्ति और समाज सेवा की ओर रुख करता है। 50 से 75 साल के इस काल में, व्यक्ति सांसारिक मोह-माया से दूर होकर अपने जीवन को परोपकार और धार्मिक गतिविधियों में समर्पित करता है। यहां पर, ईश्वर से जुड़ने का प्रयास प्रमुख उद्देश्य होता है।
4. संन्यास आश्रम – मोक्ष की ओर अंतिम कदम
संन्यास आश्रम जीवन का अंतिम चरण होता है। यह समय 75 साल के बाद, मृत्यु तक होता है। इस दौरान व्यक्ति सभी सांसारिक इच्छाओं और कर्तव्यों से मुक्त हो जाता है और आत्म-ज्ञान प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ता है। इस समय का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होना होता है। जीवन के इस अंतिम चरण में, व्यक्ति पूर्ण रूप से आत्मा और परमात्मा के मिलन की ओर अग्रसर होता है।
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