Up Kiran,Digital Desk: दुनिया की निगाहें अक्सर चीन की तटीय नीतियों पर नहीं टिकती, लेकिन उपग्रहों से मिली जानकारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चीन अफ्रीका में अपने प्रभाव को मजबूत करने के लिए रणनीतिक रूप से काम कर रहा है। इसके बंदरगाह केवल माल ढुलाई के केंद्र नहीं हैं बल्कि भविष्य के समुद्री दबदबे के संकेत भी देते हैं।
बंदरगाहों में छुपा सैन्य लाभ
पिछले दस साल में चीन ने अफ्रीका के पूर्वी और पश्चिमी किनारों पर कई बंदरगाह विकसित किए हैं। ये सुविधाएँ औपचारिक रूप से व्यावसायिक हैं, लेकिन उनकी संरचना और क्षमता को देखकर लगता है कि इन्हें युद्धपोतों और सैन्य संचालन के लिए भी तैयार किया गया है। नाइजीरिया का लेक्की पोर्ट और केन्या का मोम्बासा पोर्ट ऐसे उदाहरण हैं, जहां जरूरत पड़ने पर चीनी नौसेना तैनात हो सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार, चीन का यह मॉडल “ड्यूल यूज” यानी द्वि-उद्देश्यीय है। आम दिनों में ये व्यापारिक गतिविधियों को सहारा देते हैं और संकट के समय सैन्य समर्थन के केंद्र बन सकते हैं।
आर्थिक सुरक्षा और खनिज संसाधनों का महत्व
चीनी विस्तार सिर्फ सैन्य ताकत बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अफ्रीका में कोबाल्ट, तांबा और अन्य दुर्लभ खनिज के स्रोत हैं। चीन ने इन संसाधनों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए हाईवे और रेलवे पर भारी निवेश किया है। इसका उद्देश्य साफ है: भविष्य में वैश्विक प्रतिबंधों या संकट के समय भी चीन अपनी अर्थव्यवस्था को सुचारु रख सके।
32 देशों में 78 बंदरगाह: चीन का नेटवर्क
अमेरिकी थिंक टैंकों के आंकड़े बताते हैं कि चीन अफ्रीका के 32 देशों में कुल 78 बंदरगाहों में किसी न किसी रूप से शामिल है। यह या तो निर्माण, निवेश या संचालन के माध्यम से है। इन बंदरगाहों से चीन न केवल व्यापारिक लाभ उठाता है बल्कि वैश्विक जहाजों और संवेदनशील माल पर नजर रखने की क्षमता भी हासिल करता है।
अमेरिका और भारत के लिए बढ़ते जोखिम
इस विस्तार ने अमेरिका की सतर्कता बढ़ा दी है। जहां अमेरिकी नौसेना अपनी ताकत बढ़ाने की योजना बना रही है, वहीं चीन बड़े पैमाने पर समुद्री गतिविधियों में सक्रिय है। भारत के लिए यह स्थिति गंभीर है क्योंकि ये बंदरगाह उसके व्यापारिक मार्गों और रणनीतिक हितों को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। यदि ये स्थल पूरी तरह से सैन्य अड्डों में बदल जाते हैं, तो क्षेत्रीय संतुलन और समुद्री स्वतंत्रता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
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