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Up Kiran, Digital Desk: भारत के पहाड़ी राज्य, जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर, जिनकी ठंडी और बर्फीली सर्दियाँ प्रसिद्ध हैं, इन दिनों एक नई समस्या से जूझ रहे हैं - जंगलों में लगी आग। सामान्यत: सर्दियों में बर्फबारी का मौसम होता है, लेकिन इसके बावजूद जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह घटना केवल मौसम के बदलते पैटर्न का संकेत नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों का भी नतीजा हो सकती है।

मानव गतिविधियाँ: आग के फैलने का एक और कारण

वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों के अनुसार, जंगलों में आग लगना अब एक अप्रत्याशित घटना नहीं रह गई है। मानवीय गतिविधियाँ, जैसे शिकार के लिए जंगलों में आग लगाना, खेतों में पराली जलाना, और घास उगाने के लिए जंगलों को जलाना, इसके प्रमुख कारण बन रहे हैं। कस्तूरी मृग जैसे दुर्लभ जानवरों का शिकार करने के लिए कई बार शिकारी जानबूझकर आग लगा देते हैं, जो धीरे-धीरे विकराल रूप धारण कर लेती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन घटनाओं के पीछे सिर्फ प्राकृतिक कारण नहीं हैं, बल्कि हमारे द्वारा की जा रही लापरवाह गतिविधियाँ भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ ग्रामीण मवेशियों के लिए नई घास उगाने के उद्देश्य से जंगलों में आग लगाते हैं, जो कई बार पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है।

जंगलों में आग का बदलता पैटर्न

आंकड़ों के अनुसार, सर्दियों के दौरान जंगलों में आग की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। Forest Survey of India (FSI) के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तराखंड में 1 नवम्बर से अब तक सबसे अधिक 1,756 'फायर अलर्ट' दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़े महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जहां आमतौर पर आग की घटनाएँ अधिक होती थीं, उन्हें भी पीछे छोड़ चुके हैं।

इस बदलाव को समझने के लिए देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक अमित कुमार और उनकी टीम ने पांच साल तक अध्ययन किया। उनका मानना है कि यह आग जलवायु परिवर्तन के कारण लग रही है, जो अब सर्दियों में भी महसूस हो रही है।

अत्यधिक शुष्कता और आग का खतरा

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पिछले कुछ सालों से बारिश की कमी ने जंगलों में आग के खतरे को और बढ़ा दिया है। अक्टूबर से शुरू होकर, इन क्षेत्रों में बारिश न के बराबर हुई, जिसके कारण जंगलों में सूखापन और आग लगने की घटनाओं में वृद्धि हुई है। हिमाचल प्रदेश के प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों, जैसे कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा में भी आग की घटनाएं बढ़ी हैं। राज्य वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शिमला में सबसे अधिक 62 बार आग लगने की घटनाएँ हुई हैं।

सूखी पत्तियां और घास: एक छोटे से दंगे से बड़े हादसे तक

विज्ञानियों के मुताबिक, जब जंगलों में नमी की कमी होती है, तो सूखी घास और पत्तियाँ बारूद का रूप धारण कर लेती हैं। इस स्थिति में एक छोटी सी चिंगारी भी बड़ी आग का रूप ले सकती है। इसे लेकर अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर जलवायु परिवर्तन और वन प्रबंधन पर उचित ध्यान नहीं दिया गया, तो हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।