img

Up kiran,Digital Desk : प्रयागराज माघ मेले में संतों और बटुकों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार का मामला अब राजनीतिक और धार्मिक तूल पकड़ता जा रहा है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा 101 बटुकों के पूजन किए जाने को लेकर तीखा हमला बोला है। शंकराचार्य ने इसे 'प्रायश्चित' के बजाय 'राजनीति' करार देते हुए कहा कि फूलों की वर्षा करने और पैर छूने से उस पाप का अंत नहीं होगा, जो संगम की रेती पर हुआ है।

"पसंद के बटुक बुलाना सिर्फ राजनीति"

वाराणसी में मीडिया से मुखातिब होते हुए शंकराचार्य ने कहा, "उपमुख्यमंत्री ने अपने आवास पर 101 बटुकों का पूजन किया, यह उनकी इस स्वीकारोक्ति का प्रमाण है कि प्रयागराज में जो हुआ वह पाप था। लेकिन क्या 101 बटुकों को तिलक लगाने से वह कलंक धुल जाएगा? अगर वे गंभीर होते, तो उस वास्तविक पीड़ित बटुक के पास जाते जिसकी चोटी खींची गई और अपमान किया गया। अपनी पसंद के बटुक बुलाकर चंदन लगाना केवल दिखावा और राजनीति है।"

11 मार्च को लखनऊ में 'धर्म युद्ध' का आगाज

शंकराचार्य ने प्रदेश सरकार को घेरते हुए अपने आगामी कार्यक्रम की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा दिया गया 20 दिन का अल्टीमेटम 11 मार्च 2026 को समाप्त हो रहा है। उन्होंने एलान किया, "11 मार्च को मैं स्वयं साधु-संतों और सनातनियों के साथ लखनऊ जाऊंगा। वहां हम अपनी जांच के निष्कर्ष साझा करेंगे और आगे की रणनीति घोषित करेंगे। यह केवल प्रयागराज की घटना का विरोध नहीं है, बल्कि गोरक्षा की मांग को लेकर भी एक बड़ा आंदोलन होगा।"

भाजपा पदाधिकारियों के इस्तीफे का दावा

शंकराचार्य ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि गोरक्षा और संतों के सम्मान के मुद्दे पर भाजपा की मंशा स्पष्ट न होने के कारण पार्टी के भीतर ही असंतोष है। उन्होंने कहा, "भाजपा के 100 से ज्यादा कार्यकर्ता, पूर्व विधायक और विभिन्न पदों पर बैठे पदाधिकारी मेरी शरण में आ रहे हैं। वे सरकार की कार्यप्रणाली से क्षुब्ध होकर पार्टी छोड़ रहे हैं। सनातन परंपरा में संतों का अपमान कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा।"

क्या था पूरा मामला?

बता दें कि हाल ही में संपन्न हुए प्रयागराज माघ मेले के दौरान पुलिस और प्रशासन पर संतों व बटुकों के साथ अभद्रता करने के आरोप लगे थे। इसी घटना के बाद से शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद लगातार सरकार पर हमलावर हैं। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को 'सनातनी परंपरा का अपमान' बताते हुए भाजपा को घेरा है। अब 11 मार्च को लखनऊ में होने वाला शंकराचार्य का यह प्रदर्शन उत्तर प्रदेश की राजनीति और धार्मिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर सकता है।