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Up Kiran, Digital Desk:भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने साधारण रास्तों से निकलकर अपने दम पर राजनीति के उच्चतम मुकाम तक अपनी पहचान बनाई। आज हम उन्हीं में से एक महान शख्सियत की पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर रहे हैं, जिन्हें ‘सियासत का शिखर पुरुष’ कहा जाता है। वे जीवनभर कांग्रेस विचारधारा के प्रतिबद्ध रहे, लेकिन उनकी प्रतिष्ठा केवल दलगत राजनीति तक सीमित नहीं थी।
यह वही नेता हैं जो इंदिरा गांधी के करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे। भारतीय सरकार में उन्होंने विदेश, रक्षा और वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारियाँ निभाईं। उनके योगदान को देखते हुए वे भारत के राष्ट्रपति भी बने। हाँ, हम बात कर रहे हैं भारत रत्न प्रणब मुखर्जी की।
इंदिरा गांधी के नजदीकी और संभावित उत्तराधिकारी
11 दिसंबर 1935 को मिराती, पश्चिम बंगाल में जन्मे प्रणब मुखर्जी ने 1969 में पहली बार राज्यसभा में प्रवेश किया, इंदिरा गांधी के समर्थन से। इसके बाद 1975, 1981, 1993 और 1999 में वे राज्यसभा सदस्य बने। एक समय ऐसा आया कि उन्हें इंदिरा गांधी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाने लगा।
इंदिरा गांधी के निधन के बाद का मोड़
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मुखर्जी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें उस पद से दूर रखा। राजीव गांधी ने पार्टी की बागडोर संभाली और मुखर्जी को मंत्रिमंडल से हटाकर पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यभार में लगा दिया गया।
सियासत में वापसी और नई जिम्मेदारियाँ
1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद प्रणब मुखर्जी राजनीति की मुख्यधारा में लौट आए। पी.वी. नरसिम्हा राव ने उन्हें भारतीय योजना आयोग का उपाध्यक्ष और बाद में केंद्रीय मंत्री नियुक्त किया। 1995-1996 तक वे विदेश मंत्री रहे। उनके राजनीतिक योगदान में सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने में भी अहम भूमिका मानी जाती है। 1998-99 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने।
प्रधानमंत्री बनने का अवसर और निराशा
2004 में जंगीपुर लोकसभा से जीतने के बाद उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अवसर था। लेकिन सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को भरोसा दिया। 2009 में भी यही मौका उनके हाथ से निकल गया। माना जाता है कि अगर प्रणब मुखर्जी उस समय प्रधानमंत्री बनते, तो 2014 के परिणाम कुछ और होते।
भारत के प्रथम नागरिक के रूप में योगदान
मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हें रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। 2006 में वे फिर से विदेश मंत्री बने और 2009 से 2012 तक वित्त मंत्री रहे। इसके बाद वे भारत के राष्ट्रपति बने।
राष्ट्रवाद और बहुलवाद पर विचार
राष्ट्रपति रहते हुए 2018 में प्रणब मुखर्जी नागपुर में संघ के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने कहा कि असहिष्णुता भारत की पहचान को कमजोर करती है। उनका मानना था कि भारत का राष्ट्रवाद सार्वभौमिकता, सह-अस्तित्व और एकीकरण से जन्मा है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के विचारों का भी हवाला दिया। उनके अनुसार भारत का राष्ट्रवाद किसी धर्म, क्षेत्र या भाषा तक सीमित नहीं है बल्कि संविधान और बहुलवाद पर आधारित है।
भारत रत्न और अमर स्मृति
2019 में प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 31 अगस्त 2020 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी दूरदर्शिता, नीतिगत सूझबूझ और देशभक्ति आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।
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