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Up kiran,Digital Desk : ईरान और अमेरिका के बीच पिछले 53 दिनों से जारी भीषण तनाव और युद्ध की लपटों को शांत करने के लिए अब भारत 'शांतिदूत' की भूमिका में नजर आ सकता है। जर्मनी की यात्रा पर गए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बर्लिन में एक ऐसा बयान दिया है, जिसने वैश्विक कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। राजनाथ सिंह ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि पाकिस्तान की मध्यस्थता विफल होने के बाद अब भारत इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

'भारत निभाएगा अपनी भूमिका, मिलेगी सफलता'

बर्लिन में रक्षा एवं सुरक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि ईरान-अमेरिका विवाद को सुलझाने के लिए हर चीज का एक सही समय होता है। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा, "हो सकता है कि कल ऐसा समय आए जब भारत अपनी भूमिका निभाए और इसमें सफलता भी हासिल करे। हम इस संभावना से इनकार नहीं कर सकते।" उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही दोनों पक्षों से युद्ध समाप्त करने की अपील की है और उनका दृष्टिकोण हमेशा संतुलित रहा है।

पाकिस्तान की विफलता और भारत का उभरता कद

गौरतलब है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर ने भी इस मामले में मध्यस्थता की कोशिश की थी। ट्रंप ने उनके अनुरोध पर सीजफायर बढ़ाया जरूर, लेकिन ईरान ने इसे 'अमेरिकी चाल' बताकर ठुकरा दिया। ऐसे में दुनिया की नजरें अब भारत पर हैं, जिसके संबंध ईरान और अमेरिका—दोनों के साथ काफी गहरे और रणनीतिक हैं। राजनाथ सिंह का बयान उस समय आया है जब वैश्विक स्तर पर यह माना जा रहा है कि केवल पीएम मोदी का कद ही दोनों देशों को बातचीत की मेज पर ला सकता है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: भारत के लिए केवल 'न्यूज़' नहीं, कड़वी सच्चाई

राजनाथ सिंह ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में जारी नाकेबंदी पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, "होर्मुज में व्यवधान कोई दूर की घटना नहीं बल्कि एक कड़वी सच्चाई है, जिसका सीधा असर भारत की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर पड़ता है।"

ऊर्जा संकट: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (तेल और गैस) के लिए बड़े पैमाने पर पश्चिम एशिया पर निर्भर है।

आर्थिक प्रभाव: होर्मुज का रास्ता बंद होने से भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।

बदलते सुरक्षा खतरों पर नया दृष्टिकोण

रक्षा मंत्री ने वैश्विक सुरक्षा परिवेश में तकनीकी परिवर्तनों और जटिलताओं का जिक्र करते हुए कहा कि आज दुनिया को एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में 50 दिनों से अधिक समय से संघर्ष जारी है। भारत का यह रुख दिखाता है कि वह अब केवल एक मूकदर्शक नहीं, बल्कि एक 'ग्लोबल पावर' के रूप में समस्याओं के समाधान का हिस्सा बनना चाहता है।