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Up kiran,Digital Desk : 19वें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने समाज, धर्म और विचारधारा से जुड़े कई अहम मुद्दों पर खुलकर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने सेकुलरिज्म को लेकर अपनी सोच भी साझा की और बताया कि यह विचार उनके लिए केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीने का तरीका है।

जावेद अख्तर के लिए सेकुलरिज्म क्या है?

जावेद अख्तर का मानना है कि सेकुलरिज्म कोई भाषण या किताबी ज्ञान नहीं होता, जिसे सुनकर कुछ बिंदु याद रख लिए जाएं। उनके अनुसार, अगर कोई विचार सिर्फ भाषण तक सीमित है, तो वह ज्यादा समय तक टिक नहीं सकता।

उन्होंने कहा कि जैसे इंसान बचपन से बड़ों का सम्मान करना सीखता है, वैसे ही सेकुलर सोच भी धीरे-धीरे व्यक्ति की जीवनशैली का हिस्सा बन जाती है। जब यह सोच आदत बन जाए, तब समाज में आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व अपने आप विकसित होता है।

बचपन की एक घटना, जिसने सोच को दिशा दी

इस बातचीत के दौरान जावेद अख्तर ने अपने बचपन से जुड़ा एक किस्सा भी साझा किया, जिसने उनकी सोच पर गहरा असर डाला। उन्होंने बताया कि एक बार उनके नाना ने उन्हें 50 पैसे देने का लालच देकर धार्मिक श्लोक बोलने को कहा था। उस समय उनकी नानी ने बीच में हस्तक्षेप किया और साफ कहा कि धर्म किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए।

उस वक्त जावेद अख्तर को 50 पैसे न मिलने का अफसोस जरूर हुआ, लेकिन आज वह उस घटना को एक बड़ी सीख मानते हैं। उनका कहना है कि उसी दिन उन्होंने समझ लिया था कि आस्था व्यक्तिगत मामला है और इसे जबरदस्ती किसी पर लागू नहीं किया जा सकता।

नास्तिक होते हुए भी इंसानियत में भरोसा

जावेद अख्तर खुद को नास्तिक बताते हैं और किसी धर्म में आस्था नहीं रखते, लेकिन उनका यह भी मानना है कि हर व्यक्ति को अपने विश्वास के साथ जीने की आजादी होनी चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि धर्म का इस्तेमाल जोड़ने के लिए होना चाहिए, न कि समाज को बांटने के लिए।

उनकी यह सोच आज के दौर में खास मायने रखती है, जहां विचारधाराओं के नाम पर समाज में दूरी बढ़ती जा रही है।