Up kiran,Digital Desk : अमेरिका के साथ नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने ही देश में सियासी घेरे में आ गए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता वाले शांति बोर्ड में पाकिस्तान की भागीदारी ने विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका दे दिया है। दावोस में हुए कार्यक्रम के दौरान शहबाज शरीफ ने इस बोर्ड के चार्टर पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान वह ट्रंप के बगल में बैठे और मुस्कुराते नजर आए। पाकिस्तान सहित कुल 19 देशों के नेताओं ने इस पहल का हिस्सा बनने के लिए दस्तखत किए, लेकिन शहबाज का यह कदम देश के भीतर विवाद की वजह बन गया है।
क्या है शांति बोर्ड और क्यों बना?
शांति बोर्ड की परिकल्पना सबसे पहले गाजा युद्ध के दौरान सामने आई थी, जब अमेरिका ने क्षेत्र में शांति बहाली को लेकर अपनी योजना पेश की थी। शुरुआती तौर पर इस बोर्ड का उद्देश्य गाजा में शांति प्रक्रिया की निगरानी बताया गया, लेकिन अब इसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में मध्यस्थता करने वाले मंच के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इस बोर्ड के जरिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी अपनी अलग वैश्विक व्यवस्था खड़ी करना चाहते हैं, जिससे अमेरिका की भूमिका और प्रभाव बढ़ सके।
पीटीआई का आरोप—बिना सलाह के लिया फैसला
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने शहबाज सरकार के फैसले पर तीखी आपत्ति जताई है। पार्टी अध्यक्ष गोहर अली खान ने कहा कि प्रधानमंत्री ने बिना किसी व्यापक परामर्श के शांति बोर्ड में शामिल होने का फैसला कर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने संसद को पूरी तरह नजरअंदाज किया। गोहर अली खान ने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान को हमास को निरस्त्र करने जैसे संवेदनशील मुद्दों में भूमिका निभानी पड़ेगी। उन्होंने साफ किया कि यह कोई संयुक्त राष्ट्र का निकाय नहीं है, इसलिए सरकार को संसद को विश्वास में लेना चाहिए था।
लोकतंत्र की छवि पर भी उठे सवाल
पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के अनुसार, पीटीआई के वरिष्ठ नेता असद कैसर ने भी सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इतने संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय फैसले पर सर्वसम्मति बनाने की कोशिश तक नहीं की गई। कैसर के मुताबिक, अगर इस मुद्दे पर संसद में खुली चर्चा होती तो दुनिया को यह संदेश जाता कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मजबूत हैं।
जेयूआई-एफ की कड़ी चेतावनी
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल (जेयूआई-एफ) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने हमास को निरस्त्र करने से जुड़े किसी भी अभियान का हिस्सा बनने के खिलाफ चेतावनी दी। संसद में बोलते हुए रहमान ने कहा कि जिन लोगों पर फलस्तीनियों की बदहाली का आरोप है, वही शांति बोर्ड में शामिल हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ट्रंप से शांति की उम्मीद करना “बेवकूफों की जन्नत” में रहने जैसा है।
नेतन्याहू के साथ मंच साझा करने पर सवाल
फजलुर रहमान ने यह भी रेखांकित किया कि शांति बोर्ड के अध्यक्ष खुद ट्रंप हैं और सदस्यों का चयन भी उनकी इच्छा से हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण कराया। रहमान ने कहा कि जब गाजा में बमबारी जारी है, ऐसे में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का एक ही बोर्ड में कंधे से कंधा मिलाकर बैठना पाकिस्तान की विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।




