Up Kiran, Digital Desk: चाणक्य नीति और भारतीय दर्शन के अनुसार, पूर्णता या आदर्श स्थिति कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है। यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसे प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में मानवीय स्वभाव और समाज के आचार-विचार पर गहरे विचार किए हैं। उनके द्वारा दिए गए सूत्र "विपश्चित्स्वपि सुलभा दोषाः" और "नास्ति रत्नमखंडितम्" यह सिखाते हैं कि महानता को कभी भी केवल दोषों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके गुणों के प्रकाश में ही मापना चाहिए।
मानवीय दोष और विद्वानों का सामाजिक दायित्व
दोष और ज्ञान का संयोग
चाणक्य का यह कथन "विपश्चित्स्वपि सुलभा दोषाः" हमें यह समझाने की कोशिश करता है कि विद्वान और ज्ञानवान व्यक्तियों में भी कभी न कभी कुछ त्रुटियाँ देखने को मिल सकती हैं। उनका मानना था कि जब तक कोई इंसान शरीर में है, वह प्रकृति के तीन गुणों – सत्त्व, रजस और तमस – के प्रभाव में रहता है। ऐसे में यह सोचना कि कोई व्यक्ति पूर्ण रूप से दोषमुक्त हो सकता है, वास्तविकता से परे है।
समाज के लिए यह अपेक्षाएँ अनावश्यक हैं कि कोई व्यक्ति पूरी तरह से त्रुटिहीन हो। अगर हम किसी बड़े विद्वान की एक छोटी सी भूल पर ध्यान केंद्रित करने लगे, तो हम उस व्यक्ति के विशाल ज्ञान और योगदान को नकार देंगे। उदाहरण के लिए, सूर्य में भी एक छोटा सा धब्बा हो सकता है, लेकिन क्या हम उस छोटे से दोष के कारण सूर्य के प्रकाश को छोड़ सकते हैं?
क्यों होती हैं छोटी कमजोरियां?
चाणक्य ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी उच्च कोटि के रत्न में एक सूक्ष्म रेशा या दोष हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उस रत्न की मूल्य को नकार दें। उनका उद्धारण "नास्ति रत्नमखंडितम्" यह सिखाता है कि रत्न कभी भी संपूर्ण रूप से दोषरहित नहीं होते। लेकिन रत्न की वास्तविक कीमत उसके गुणों, चमक और दुर्लभता में छिपी होती है, न कि उस एक मामूली दोष में।
इसी तरह, हमारे समाज के महान लोग, जो जीवन के हर पहलू में उत्कृष्टता प्रदर्शित करते हैं, यदि उनमें कोई सामान्य दोष हो, तो इसे उनके ज्ञान और महानता से कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।
क्यों नजरअंदाज करें छोटी गलतियां?
सकारात्मक दृष्टिकोण का महत्व
चाणक्य की नीति में यह महत्वपूर्ण बात छिपी हुई है कि यदि हम सिर्फ दूसरों की गलतियों पर ध्यान देंगे, तो समाज में आदर्श व्यक्ति ढूंढना मुश्किल होगा। समाज में अच्छाइयों और गुणों का सम्मान करने से ही सकारात्मकता का प्रसार होता है। यदि हम समाज के सभी व्यक्तियों की कमजोरियों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो अंततः कोई आदर्श व्यक्ति नहीं बच पाएगा।
भारतीय संस्कृति में यह शिक्षा दी गई है कि जैसे हंस पानी को छोड़कर दूध चुनता है, वैसे ही हमें दूसरों के दोषों को छोड़कर उनके गुणों को ग्रहण करना चाहिए। यह दृष्टिकोण हमारी सोच को सकारात्मक दिशा में मार्गदर्शन करता है।


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