Up kiran,Digital Desk : उच्चतम न्यायालय में शबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े संवैधानिक मुद्दों पर चल रही नौ-सदस्यीय पीठ की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को जनहित याचिकाओं (PIL) के बदलते स्वरूप और उनके संभावित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि 2006 में जिस आधार पर शबरीमला याचिका स्वीकार की गई थी, आज के 'सतर्क' न्यायिक परिवेश में उसे पहली नजर में ही खारिज कर दिया जाता।
"भक्त नहीं, वकीलों के संगठन ने दी चुनौती": जस्टिस नागरत्ना
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मूल याचिकाकर्ताओं की साख (Locus Standi) पर सवाल उठाए। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या इस परंपरा को भगवान अयप्पा के किसी वास्तविक श्रद्धालु ने चुनौती दी थी?
वकीलों का संगठन: तुषार मेहता ने बताया कि याचिकाकर्ता 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' है, न कि श्रद्धालुओं का कोई समूह।
अदालत का रुख: जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जिसका मंदिर या उस धर्म से कोई सीधा संबंध नहीं है, वह याचिका दायर करता है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत उसे वाद का आधार न होने के कारण खारिज कर दिया जाना चाहिए।
PIL का 'छिपा हुआ एजेंडा' और CJI की टिप्पणी
CJI सूर्यकांत ने 'जनहित' के नाम पर दायर होने वाली याचिकाओं के पीछे के 'निजी एजेंडे' पर कड़ा प्रहार किया:
अदृश्य पीड़ित: मुख्य न्यायाधीश ने ऐसे याचिकाकर्ताओं के लिए 'अदृश्य पीड़ित' शब्द का प्रयोग किया, जो स्वयं प्रभावित नहीं होते लेकिन दूसरों के मुद्दों को अदालत में लाते हैं।
सतर्कता: CJI ने कहा कि अब अदालतें PIL स्वीकार करने में बहुत सावधानी बरत रही हैं क्योंकि कई याचिकाएं 'प्रायोजित' (Sponsored) होती हैं और उनके पीछे कोई और हित समूह होता है।
[Image Concept: A visual representation of the Supreme Court scales of justice and a symbolic gate of the Sabarimala Temple]
तुषार मेहता की दलील: "मौन बहुमत बनाम मुखर अल्पसंख्यक"
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जनहित याचिकाओं के विकासक्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा:
पुराना दौर: PIL की शुरुआत तब हुई थी जब लोगों के पास अदालत पहुंचने के साधन नहीं थे।
आज का दौर: ई-फाइलिंग और विधिक सेवा प्राधिकरण (Legal Aid) के कारण अब कोई भी पीड़ित सीधे अदालत पहुंच सकता है। अब 'प्रतिनिधित्व' के नाम पर बाहरी लोगों के हस्तक्षेप की आवश्यकता कम है।
प्रायोजित याचिकाएं: उन्होंने कहा कि आज कई PIL केवल चर्चा बटोरने या किसी विशेष एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दाखिल की जाती हैं।
शबरीमला विवाद: अब तक क्या हुआ?
सितंबर 2018: 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से 10-50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटाया था।
नवंबर 2019: जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने मामले को बड़ी बेंच (9 जजों की पीठ) के पास भेजा ताकि धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा तय की जा सके।
वर्तमान स्थिति: 9 जजों की पीठ अब इस पर विचार कर रही है कि क्या कोई गैर-श्रद्धालु किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है और संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए।




