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Up Kiran, Digital Desk: आज की दुनिया में हर कोई एक अच्छी नौकरी, बड़ा पैकेज और आरामदायक ज़िंदगी का सपना देखता है। लेकिन ज़रा सोचिए, क्या हो जब किसी को यह सब मिल जाए और फिर भी उसे लगे कि कुछ तो है जो कम है... कि असली ख़ुशी यहाँ नहीं है? यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं, बल्कि दिल्ली के एक इंजीनियर मोहित की हक़ीक़त है, जो आज दुनिया के लिए मधुसूदन मुकुंद दास बन चुके हैं।

यह कहानी है एक ऐसे सफ़र की, जो शिकागो की ऊंची इमारतों से शुरू होकर रांची के एक शांत मंदिर तक पहुँचता है, और हमें बताती है कि असली सुख आख़िर कहाँ मिलता है।

करोड़ों का पैकेज, पर दिल में था खालीपन

कभी मोहित के नाम से जाने जाने वाले मधुसूदन दास, दिल्ली के एक होनहार छात्र थे। उन्होंने प्रतिष्ठित 'दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग' से पढ़ाई पूरी की और उन्हें अमेरिका के शिकागो में एक नामी कंपनी में नौकरी मिल गई। उनकी सालाना सैलरी 1.25 करोड़ रुपये थी। उनके पास वो सब कुछ था, जिसका कोई भी सपना देखता है - पैसा, सफलता, एक शानदार करियर और ऐशो-आराम की ज़िंदगी।

लेकिन इन सब चकाचौंध के बीच, उन्हें अंदर ही अंदर एक खालीपन महसूस होता था। उन्हें लगता था कि इस भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में मन की शांति कहीं खो गई है।

और फिर एक दिन ज़िंदगी ने लिया नया मोड़

इसी उधेड़बुन के बीच, एक दिन वह शिकागो में स्थित इस्कॉन (ISKCON) मंदिर पहुँचे। वह दिन उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। मंदिर के शांत और भक्तिमय माहौल ने उन्हें पहली बार एक अलग तरह के सुकून का एहसास कराया। वहाँ उन्होंने 'श्रीमद्भगवद्गीता' पढ़ी और जैसे-जैसे वह उसके पन्ने पलटते गए, उनके मन के सारे सवाल, सारी बेचैनी के जवाब मिलते चले गए।

उन्हें यह समझ आ गया कि जिस ख़ुशी की वह तलाश कर रहे हैं, वह बाहरी दुनिया की चीज़ों और पैसों में नहीं, बल्कि आध्यात्म और ईश्वर की भक्ति में है।

शिकागो से रांची एक नए जीवन की शुरुआत

इस आत्म-ज्ञान के बाद, उन्होंने एक ऐसा फ़ैसला लिया जिसने सबको हैरान कर दिया। उन्होंने अपनी 1.25 करोड़ की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया, शिकागो की आरामदायक ज़िंदगी को अलविदा कहा और कृष्ण भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए भारत लौट आए।

आज मधुसूदन मुकुंद दास रांची के इस्कॉन मंदिर में एक साधक का जीवन जी रहे हैं। उनका दिन सुबह 4:30 बजे मंगला आरती से शुरू होता है और पूरा दिन भगवान श्री कृष्ण की सेवा, भजन-कीर्तन और प्रचार में बीतता है।

सूट-बूट की जगह अब वे गेरुए रंग के वस्त्र पहनते हैं। वे कहते हैं, "सांसारिक सुख और ऐशो-आराम सिर्फ़ शरीर के लिए होते हैं और ये अस्थायी हैं। लेकिन कृष्ण की भक्ति और सेवा से जो आनंद और शांति मिलती है, वह आत्मा के लिए है और वही असली और स्थायी ख़ुशी है।"

मधुसूदन दास की यह कहानी हम सभी को एक पल रुककर यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम जिस ख़ुशी के पीछे भाग रहे हैं, क्या वह वाक़ई सच्ची है?