img

Up Kiran, Digital Desk: 1966 का वह सर्द और धुंधला दिन, जब दुनिया ने हिंदुस्तान के सबसे बड़े वैज्ञानिक और परमाणु कार्यक्रम के अग्रणी होमी जहांगीर भाभा को खो दिया। एयर इंडिया की फ्लाइट 101 ‘कंचनजंघा’, यूरोप के बर्फीले पहाड़ों के ऊपर आसमान में उड़ान भर रही थी। विमान के अंदर बैठा था वह महान वैज्ञानिक, जिनकी खोजों और दृष्टिकोणों ने भारत को एक नई दिशा दी थी। वह चुपके से इतिहास में एक गहरी छाप छोड़ने वाले थे, लेकिन कुछ ही मिनटों में यह यात्रा एक ऐसी त्रासदी में बदल गई, जिसने न सिर्फ विज्ञान के क्षेत्र को, बल्कि पूरे देश को एक अभूतपूर्व सदमा दिया।

दुर्घटना की वजह आज भी रहस्य

विमान फ्रेंच आल्प्स की माउंट ब्लांक पर्वतमाला से टकरा गया। यह हादसा इतना भयावह था कि विमान में सवार सभी 117 यात्रियों और 11 क्रू मेंबरों की जान चली गई। इस दुर्घटना ने भारत को अपूरणीय क्षति दी, क्योंकि वह केवल एक विमान दुर्घटना नहीं थी—बल्कि यह भारत के परमाणु भविष्य की एक कड़ी थी, जो अचानक टूट गई। होमी भाभा की मौत ने भारतीय विज्ञान और परमाणु अनुसंधान को झकझोर दिया था।

भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई में हुआ था। बचपन से ही उनका विज्ञान से गहरा लगाव था। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, भाभा ने भारतीय विज्ञान जगत में अपनी जगह बनाई और 1939 में सीवी रमन के साथ काम करने के लिए भारत लौट आए। 1945 में टाटा ट्रस्ट के सहयोग से उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना की, जो आज भी भारत का प्रमुख रिसर्च सेंटर है।

1948 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें परमाणु ऊर्जा आयोग का चेयरमैन नियुक्त किया। भाभा ने भारतीय राजनीति और सुरक्षा के संदर्भ में परमाणु ऊर्जा के महत्व को बताया और इसे आत्मनिर्भरता के साधन के रूप में प्रस्तुत किया। उनका सपना था कि भारत को परमाणु शक्ति प्राप्त हो, और इसके लिए उन्होंने बीएआरसी (Bhabha Atomic Research Centre) की स्थापना की।

आपको बता दें कि भाभा ने सन् 1965 में ही खुलकर कहा था कि यदि सरकार हरी झंडी दे तो भारत डेढ़ साल में परमाणु बम बना सकता है। उनका ये बयान काफी चर्चा में आया था मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था।