Up Kiran, Digital Desk: 4 अक्टूबर 1582 की रात, यूरोप में हर कोई सामान्य रूप से अपनी रात की नींद ले रहा था। लेकिन जब 5 अक्टूबर को सूरज उगा, तो तारीख 15 अक्टूबर थी। यानी 4 अक्टूबर से सीधे 15 अक्टूबर तक, कुल 10 दिन गायब हो गए थे। यह घटना यूरोप में खलबली मचा दी थी, और लोगों के मन में सवाल थे कि इन "गायब" दिनों का क्या होगा। कहीं इस बदलाव का असर उनकी जिंदगी पर तो नहीं पड़ेगा? कई लोग इस बदलाव को लेकर गुस्से में थे, जबकि खगोलशास्त्रियों ने इसे अपने अध्ययनों के लिए नुकसानदेह माना। इस निर्णय का विरोध कई देशों ने किया, जैसे इंग्लैंड, रूस और ग्रीस, जिन्होंने इसे अपनी तारीखों से छेड़छाड़ मानते हुए कई दशकों तक इसके खिलाफ आवाज उठाई।
कैलेंडर का इतिहास: जूलियन से ग्रेगोरियन तक
जिस कैलेंडर का हम आज इस्तेमाल करते हैं, उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहा जाता है, जो 4 अक्टूबर 1582 से लागू हुआ। इससे पहले यूरोप में जूलियन कैलेंडर का प्रयोग किया जाता था, जिसे रोमन सम्राट जूलियस सीज़र ने 45 ईसा पूर्व में अपनाया था। हालांकि, जूलियन कैलेंडर में एक बड़ी खामी थी – इसका गणना तरीका सूर्य और चंद्रमा के चक्र से मेल नहीं खाता था। यही कारण था कि खगोलज्ञ और गणना करने वाले पादरी इसके सुधार की मांग कर रहे थे।
भारत में भी समय की गणना अलग-अलग तरीके से होती थी। उत्तर और मध्य भारत में विक्रम संवत का प्रयोग होता था, जबकि दक्षिण और पश्चिम भारत में शक संवत का प्रचलन था। मुग़ल काल में हिजरी कैलेंडर भी प्रचलित था।
जूलियन कैलेंडर की कमियों का असर
जूलियन कैलेंडर में हर साल को 365.25 दिन माना गया था, और हर चार साल में एक लीप डे जोड़ा जाता था। हालांकि, इसका वास्तविक सौर वर्ष से मेल नहीं खाता था। असल में, सूर्य का एक सौर वर्ष लगभग 365.2422 दिन का होता है, जो जूलियन कैलेंडर से लगभग 11 मिनट कम था। यह छोटी सी गलती यूरोप के कैलेंडर को कई वर्षों तक प्रभावित करती रही। हर साल जमा होने वाले ये 11 मिनट अंततः यूरोपीय त्योहारों के चक्र को गड़बड़ कर देते थे। 1570 तक वसंत विषुव (जिससे ईस्टर का दिन तय होता है) 21 मार्च से खिसक कर 11 मार्च पर आ गया था। इस कारण यूरोप में ईस्टर मनाने की तारीख भी बदल गई थी।
10 दिन का सुधार और कैलेंडर का नया रूप
इस खामी को सुधारने के लिए इटली के खगोलज्ञ एलोइसियस लिलियस ने 10 दिन हटाने का सुझाव दिया और लीप वर्ष के नियमों को भी नया रूप देने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद पोप ग्रेगरी XIII ने 4 अक्टूबर 1582 को इस सुधार को लागू किया और ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरुआत हुई। नए कैलेंडर में, वह साल जो 4 से विभाजित होते थे, वे लीप वर्ष होते थे, लेकिन सदी के साल (जैसे 1700 और 1800) को लीप वर्ष नहीं माना जाता था, जब तक कि वे 400 से विभाजित न हों।
जनवरी से साल की शुरुआत और कैलेंडर में बदलाव
ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ, साल की शुरुआत जनवरी से होने लगी, जबकि जूलियन कैलेंडर में साल की शुरुआत मार्च से होती थी। यह बदलाव केवल धार्मिक कारणों से किया गया था, ताकि ईस्टर जैसे त्योहारों की तारीखें सही रूप से निर्धारित की जा सकें। हालांकि, वैज्ञानिक सटीकता पर इसका कोई खास ध्यान नहीं था।
अभी भी कुछ खामियां: 26 सेकंड की गड़बड़ी
ग्रेगोरियन कैलेंडर में भी कुछ खामियां हैं। इसमें हर साल लगभग 26 सेकंड की कमी होती है। इसका असर तब होगा जब तक यह कैलेंडर पूरी तरह से सूर्य के वास्तविक सौर वर्ष से मेल नहीं खाता। इसके कारण 4909 तक ग्रेगोरियन कैलेंडर एक दिन सौर वर्ष से आगे हो जाएगा।
महत्वपूर्ण बदलाव और नई तारीखें
भारत में, 1751 तक लोग मार्च में नया साल मनाते थे, लेकिन ब्रिटिश संसद ने 1750 में जनवरी से नया साल शुरू करने का आदेश दिया। इसके साथ ही, भारत में भी ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया गया। इस कैलेंडर की विभिन्न तारीखों और महीनों की असमान लंबाई से भी यूरोपीय राजनीति और पौराणिक निर्णयों का पता चलता है। फरवरी में 28 या 29 दिन होते हैं, जबकि जुलाई और अगस्त में 31 दिन होते हैं, जो जूलियस सीज़र और सम्राट ऑगस्टस के फैसलों का परिणाम थे।
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