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Up Kiran, Digital Desk: भारतीय क्रिकेट का इतिहास सिर्फ ट्रॉफियों और जीत की कहानी नहीं है, बल्कि इसके बीच में ऐसी घटनाएं भी हैं जो खेल की आत्मा को हिलाकर रख देती हैं। एक ऐसी ही कहानी है रमण लांबा की, जिनकी जिंदगी और करियर खेल के संघर्ष, हुनर और दुख की त्रासदी से भरी हुई थी।

रमण लांबा का संघर्षपूर्ण क्रिकेट करियर

2 जनवरी 1960 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में जन्मे रमण लांबा एक आक्रामक सलामी बल्लेबाज थे। दाएं हाथ से खेलने वाले लांबा ने भारत के लिए भले ही केवल चार टेस्ट मैच खेले, लेकिन घरेलू क्रिकेट में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। अपनी तकनीकी कौशल और शानदार खेल के लिए लांबा को भरोसेमंद ओपनर के रूप में जाना जाता था। बावजूद इसके, उनका नाम क्रिकेट की मुख्यधारा से हमेशा के लिए जुड़ा रहेगा, और इसका कारण था 1991 का दलीप ट्रॉफी फाइनल।

दलीप ट्रॉफी फाइनल 1991: जब क्रिकेट शर्मिंदा हुआ

दलीप ट्रॉफी 1991 का फाइनल क्रिकेट इतिहास में हमेशा एक काले अध्याय के रूप में याद रखा जाएगा। जमशेदपुर के कीनन स्टेडियम में खेले गए इस मैच में नॉर्थ जोन और वेस्ट जोन के बीच मुकाबला था। कप्तान कपिल देव के नेतृत्व में नॉर्थ जोन ने पहले पारी में 729 रन बनाकर वेस्ट जोन को दबाव में डाल दिया। जवाब में वेस्ट जोन 561 रन बनाकर ऑलआउट हो गया। हालांकि, जब पांचवे दिन नॉर्थ जोन ने दूसरी पारी शुरू की, तो खेल का मिजाज बदलने लगा।

रमण लांबा, जिन्होंने पहले पारी में 180 रन बनाए थे, और अजय जडेजा ओपनिंग कर रहे थे। खेल सामान्य चल रहा था, लेकिन तभी एक ऐसा मोड़ आया जिसने क्रिकेट को शर्मसार कर दिया।

राशिद पटेल का गुस्सा और हिंसा का मंजर

वेस्ट जोन के तेज गेंदबाज राशिद पटेल का गुस्सा आखिरकार सामने आ गया। उन्होंने राउंड द विकेट गेंदबाजी करते हुए लांबा के ऊपर एक खतरनाक बीमर फेंकी, जो लांबा के सिर के पास से निकल गई। लांबा ने नाराजगी जताई, लेकिन यह विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ। राशिद ने फिर लांबा की ओर दौड़ते हुए स्टंप उखाड़े और उनका पीछा किया। यह पीछा पूरे मैदान में हुआ और दर्शकों ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की। हालात इतने बिगड़े कि दर्शकों ने पत्थर फेंके, और विनोद कांबली को चोट लगी। इस घटना के बाद मैच रद्द कर दिया गया और दोनों टीमों को पवेलियन भेजा गया।

नतीजा और क्रिकेट पर इसका असर

इस घटनाक्रम के बाद राशिद पटेल को 13 महीने के लिए बैन कर दिया गया, जबकि रमण लांबा को भी 10 महीने का प्रतिबंध झेलना पड़ा। हालांकि लांबा पूरी तरह निर्दोष नहीं थे, क्योंकि मैच के दौरान कुछ शब्दों का आदान-प्रदान भी हुआ था, लेकिन हिंसा ने क्रिकेट की मर्यादाओं को तोड़ा और खेल की गरिमा को गहरी चोट पहुंचाई।

रमण लांबा की दुखद मृत्यु

रमण लांबा की दुखद यात्रा यहीं खत्म नहीं हुई। 1998 में बांग्लादेश में क्लब क्रिकेट खेलते हुए वह एक और कड़ी का सामना कर रहे थे। ढाका में एक मैच के दौरान जब वे शॉर्ट लेग पर बिना हेलमेट के फील्डिंग कर रहे थे, तभी बल्लेबाज मेहराब हुसैन ने एक तेज शॉट खेला और गेंद सीधे लांबा के सिर पर लगी। लांबा की स्थिति गंभीर थी, और उन्हें दिल्ली से न्यूरोसर्जन बुलवाया गया, लेकिन अफसोस कि उनका बचाव नहीं किया जा सका। महज 38 साल की उम्र में रमण लांबा ने अपनी जान गंवा दी।

खिलाड़ियों की सुरक्षा पर गहरा सवाल

लांबा की मौत ने क्रिकेट में सुरक्षा के उपायों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए, विशेष रूप से शॉर्ट लेग पर फील्डिंग करते वक्त हेलमेट पहनने के महत्व पर। उनकी मृत्यु ने इस बात को और स्पष्ट किया कि क्रिकेट चाहे जितना भी बड़ा खेल हो, खिलाड़ी की सुरक्षा हमेशा सबसे अहम होनी चाहिए।