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आज हम आपको कूटनीति की दुनिया के उस दौर में वापस ले चलते हैं जब दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें अमेरिका और चीन के बीच रिश्ते बेहद नाजुक मोड़ पर थे। यह वह समय था जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक बहुप्रतीक्षित मुलाकात होने वाली थी, और इस मुलाकात से ठीक पहले चीन ने अमेरिका को एक बड़ी ही सधी हुई भाषा में चेतावनी दे डाली थी।

क्या था पूरा मामला: उस दौरान अमेरिका और चीन के बीच एक तीखा ट्रेड वॉर चल रहा था। दोनों देश एक-दूसरे के सामान पर भारी टैक्स लगा रहे थे, जिससे दुनिया भर के बाजार में उथल-पुथल मची हुई थी। कई महीनों की तनावपूर्ण बातचीत और वार्ताओं के बाद, बड़ी मुश्किल से कुछ मुद्दों पर सहमति बन पाई थी। इसी माहौल में ट्रंप और शी की मुलाकात होनी थी, जिससे उम्मीद की जा रही थी कि शायद यह ट्रेड वॉर खत्म हो जाए।

लेकिन इस मुलाकात से ठीक पहले, चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी किया। इस बयान में चीन ने अमेरिका से कहा कि दोनों देशों को उन "बड़ी मुश्किल से हासिल हुए सकारात्मक नतीजों" (hard-won results) की रक्षा करनी चाहिए जो अब तक की बातचीत से मिले हैं।

इस बयान का असली मतलब क्या था?

कूटनीतिक भाषा में यह चीन की तरफ से एक सीधी चेतावनी थी। चीन अमेरिका से कह रहा था कि:

पुरानी मेहनत बेकार न जाए: हमने महीनों लगाकर जो थोड़ी-बहुत सहमति बनाई है, उसे किसी भी नए एक्शन से खराब मत करना।

समझौते का सम्मान करें: जो बातें तय हो चुकी हैं, उनका सम्मान किया जाना चाहिए।

तनाव और न बढ़ाएं: इस अहम मुलाकात से पहले कोई भी ऐसा कदम न उठाएं जिससे माहौल और बिगड़ जाए।

चीन को डर था कि राष्ट्रपति ट्रंप अपने अप्रत्याशित स्वभाव के कारण मुलाकात से ठीक पहले कोई नया टैरिफ या प्रतिबंध लगाकर सारा खेल बिगाड़ सकते हैं। इसलिए, चीन ने पहले ही यह साफ कर दिया कि वह इस बातचीत को लेकर गंभीर है, बशर्ते अमेरिका भी पुरानी सहमतियों का सम्मान करे। यह घटना दिखाती है कि कैसे दो महाशक्तियों के बीच शिखर बैठकों से पहले पर्दे के पीछे दिमागी खेल और रणनीतिक बयानबाजी चलती है।