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Up Kiran, Digital Desk: बिहार में विधानसभा चुनाव का माहौल गर्म है। पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर को हो चुकी है, दूसरा चरण 11 नवंबर को होगा। नतीजे 14 नवंबर को सामने आएंगे। लेकिन इस बार चर्चा सिर्फ वोटों की नहीं, बल्कि उस खास स्याही की भी हो रही है जो हर वोटर की उंगली पर लगाई जाती है।

जब आप वोट डालते हैं, तो आपकी उंगली पर जो स्याही लगाई जाती है, वो सिर्फ एक निशान नहीं होती। ये स्याही एक वोटर की पहचान बन जाती है। इसका मकसद है—एक व्यक्ति दो बार वोट न डाल सके। भारत ही नहीं, दुनिया के करीब 90 देशों में इसी स्याही का इस्तेमाल होता है। यही स्याही पल्स पोलियो अभियान में भी काम आती है।

क्यों नहीं मिटती ये स्याही?

इस स्याही को हटाना आसान नहीं। इसमें सिल्वर नाइट्रेट और कुछ खास केमिकल मिलाए जाते हैं। ये 20 से 40 सेकेंड में सूख जाती है और गहरे रंग की छाप छोड़ती है। पहले नीली दिखती है, फिर काली हो जाती है। एक बार लग जाए तो एक से दो महीने तक उंगली पर बनी रहती है। इसका फॉर्मूला नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी ने चुनाव आयोग को दिया था। ये फॉर्मूला आज तक किसी को नहीं बताया गया।

कहां बनती है ये स्याही?

भारत में दो जगहों पर चुनावी स्याही बनाई जाती है—हैदराबाद की रायडू लेबोरेटरी और मैसूर की मैसूर पेंट्स एंड वॉर्निश लिमिटेड। चुनाव आयोग सिर्फ मैसूर वाली स्याही का इस्तेमाल करता है। हैदराबाद वाली स्याही विदेशों में भेजी जाती है।

कितनी महंगी है ये स्याही?

2019 के लोकसभा चुनाव में 26 लाख बोतलें ऑर्डर की गई थीं। इन पर करीब 33 करोड़ रुपये खर्च हुए। यानी एक बोतल की कीमत करीब 127 रुपये बैठती है। एक बोतल में 10 एमएल स्याही होती है। मतलब एक एमएल की कीमत करीब 12.7 रुपये। एक लीटर स्याही की कीमत 12,700 रुपये होती है।