पहले पर्यटक बनकर भारत आए, फिर विरासत बचाने में लगा दिया पूरा जीवन; 80 वर्षीय आयरिश बुजुर्ग 'पागल साब' की कहानी वायरल
भारत की ऐतिहासिक विरासत और संस्कृति में कुछ ऐसा जादू है कि जो एक बार यहां आता है, यहीं का होकर रह जाता है। ऐसी ही एक बेहद खूबसूरत और जज्बे से भरी कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। यह कहानी है 80 साल के एक आयरिश बुजुर्ग की, जो करीब पांच दशक पहले सिर्फ एक आम पर्यटक के रूप में भारत घूमने आए थे। लेकिन यहां की प्राचीन कला और ऐतिहासिक धरोहरों से उन्हें ऐसा प्रेम हुआ कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसे सहेजने में समर्पित कर दी। स्थानीय लोग आज उन्हें बड़े प्यार और सम्मान से 'पागल साब' (पागल साहब) कहकर बुलाते हैं। आइए जानते हैं आखिर कौन हैं ये बुजुर्ग और क्यों इनके इस जुनून की पूरी दुनिया कायल हो रही है।
50 साल पहले पर्यटन के लिए आए और यहीं के होकर रह गए
इस अनोखे बुजुर्ग का असली नाम जॉन है, जो मूल रूप से आयरलैंड के रहने वाले हैं। सत्तर के दशक में जब वे पहली बार भारत आए, तो उनका इरादा सिर्फ यहां के ऐतिहासिक स्थलों को देखना था। लेकिन भारत के प्राचीन किलों, बावड़ियों और खंडहर हो रही इमारतों की शिल्पकला ने उनका दिल जीत लिया। उन्होंने महसूस किया कि देखरेख की कमी के कारण देश की कई अमूल्य ऐतिहासिक कड़ियां धीरे-धीरे नष्ट हो रही हैं। बस इसी बात ने उनके जीवन का मकसद बदल दिया। उन्होंने अपने वतन लौटने का विचार छोड़ दिया और भारत की प्राचीन विरासत के संरक्षण को ही अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया।
स्थानीय लोगों ने क्यों दिया 'पागल साब' का अनोखा नाम
जॉन ने भारत के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्थित उन ऐतिहासिक धरोहरों को चुन-चुनकर साफ और रीस्टोर करना शुरू किया, जिन पर प्रशासन या आम लोगों का ध्यान नहीं जा रहा था। कड़ी धूप और धूल-मिट्टी के बीच, बिना किसी सरकारी मदद के, वे अकेले ही कुदाल और झाड़ू लेकर ऐतिहासिक स्थलों की सफाई में जुट जाते थे। शुरुआत में स्थानीय ग्रामीणों को उनका यह व्यवहार समझ नहीं आया। लोग सोचने लगे कि सात समंदर पार से आया एक विदेशी गोरा आखिर क्यों इन लावारिस पड़े खंडहरों को चमकाने में अपना दिन-रात एक कर रहा है। इसी दीवानेपन और जूनून को देखकर ग्रामीणों ने उन्हें बड़े प्यार से 'पागल साब' कहना शुरू कर दिया, जो बाद में उनकी पहचान बन गया।
युवाओं को दे रहे हैं विरासत से जुड़ने का बड़ा संदेश
80 साल की उम्र पार कर जाने के बाद भी जॉन का यह सफर थमा नहीं है। आज भी वे उसी जोश के साथ पुरानी बावड़ियों, प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक दीवारों की मरम्मत और उनकी साफ-सफाई में लगे रहते हैं। सोशल मीडिया पर उनके इस निस्वार्थ काम के वीडियो वायरल होने के बाद, अब देश भर के युवा उनसे जुड़ रहे हैं। जॉन का मानना है कि किसी भी देश की पहचान उसकी प्राचीन विरासत से होती है, और इसे बचाना सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है।
सोशल मीडिया पर मिल रहा है दुनिया भर से सलाम
इंटरनेट पर 'पागल साब' की कहानी सामने आने के बाद देश-विदेश के लाखों लोग उनके इस निस्वार्थ योगदान को सलाम कर रहे हैं। यूजर्स कमेंट्स में लिख रहे हैं कि जहां हम अपनी ही धरोहरों को नुकसान पहुंचाने या उन पर नाम लिखने में नहीं हिचकिचाते, वहीं एक विदेशी नागरिक ने अपनी जिंदगी के 50 साल हमारी संस्कृति को बचाने में लगा दिए। जॉन की यह कहानी हमें सिखाती है कि अपनी मिट्टी और इतिहास से प्यार करने के लिए किसी सरहद की बंदिश नहीं होती, बस मन में एक सच्चा जूनून होना चाहिए।