बिहार के इंजीनियरिंग छात्रों के भविष्य से बड़ा खिलवाड़, सूबे के एक भी कॉलेज को नहीं मिली 'NBA' मान्यता
बिहार में नीतीश-तेजस्वी सरकार और शिक्षा विभाग भले ही तकनीकी शिक्षा के विस्तार के बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन धरातल पर सच्चाई बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली है। राज्य में इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या तो तेजी से बढ़ी है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी साख शून्य साबित हो रही है। एक बेहद कड़वे और सनसनीखेज खुलासे के तहत यह बात सामने आई है कि बिहार का एक भी सरकारी या निजी इंजीनियरिंग कॉलेज अब तक नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रिडिटेशन (NBA) की प्रतिष्ठित मान्यता हासिल करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। इस राष्ट्रीय मान्यता के न होने का सीधा और घातक असर बिहार के हजारों होनहार छात्रों के करियर, उनके कॉर्पोरेट प्लेसमेंट और खुद इन तकनीकी संस्थानों की साख पर पड़ रहा है, जिससे युवाओं का भविष्य पूरी तरह अधर में लटक गया है।
60 कॉलेज और 14 हजार बीटेक सीटें, फिर भी हर साल खाली रह जाते हैं हजारों दाखिले
वर्तमान में बिहार के भीतर सरकारी और निजी क्षेत्रों को मिलाकर करीब 60 इंजीनियरिंग कॉलेज संचालित हो रहे हैं। इनमें से केवल सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में ही बीटेक (B.Tech) की लगभग 14,000 से अधिक सीटें युवाओं के लिए उपलब्ध हैं। इसके बावजूद बिहार के युवाओं में अब अपने ही राज्य के इन कॉलेजों को लेकर मोहभंग हो रहा है और हर साल काउंसलिंग के बाद भी हजारों सीटें खाली रह जाती हैं। तकनीकी शिक्षा के विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के अनुसार, सीटों के खाली रहने की सबसे मुख्य वजह इन संस्थानों में विश्वस्तरीय गुणवत्ता का न होना, बेहद खराब या नाममात्र का प्लेसमेंट रिकॉर्ड और सबसे बढ़कर एनबीए जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रामाणिक मान्यता का अभाव है। इसी वजह से छात्र बिहार छोड़कर दूसरे राज्यों का रुख करने को मजबूर हैं।
आखिर क्यों जरूरी है एनबीए मान्यता? डिग्री होने के बाद भी छात्रों को विदेशों में नहीं मिल रही तरजीह
नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रिडिटेशन (NBA) दरअसल किसी भी इंजीनियरिंग संस्थान के पाठ्यक्रम, इंफ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई की गुणवत्ता का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कड़ा मूल्यांकन करता है। एनबीए की टीम कॉलेज की फैकल्टी, रिसर्च वर्क, लैब्स की स्थिति, उद्योगों (इंडस्ट्री) के साथ जुड़ाव और छात्रों के पिछले परीक्षा परिणामों की सघन जांच करने के बाद ही यह विशेष टैग देती है। जिन संस्थानों के पास एनबीए की मान्यता होती है, वहां से पास आउट होने वाले छात्रों की डिग्री को देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हाथों-हाथ लिया जाता है। बिहार के कॉलेजों में यह मान्यता न होने के कारण यहां के डिग्रीधारियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) में रिजेक्ट कर दिया जाता है और उन्हें विदेशों में उच्च शिक्षा या नौकरी के लिए भटकना पड़ता है।
कैंपस प्लेसमेंट का बेहद खराब रिकॉर्ड, परमानेंट प्रोफेसरों की जगह गेस्ट फैकल्टी के भरोसे चल रहे हैं संस्थान
बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेजों की दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी उनका बेहद लचर और कमजोर प्लेसमेंट रिकॉर्ड है। देश के अन्य राज्यों के राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों की तुलना में बिहार में नामचीन कंपनियों की कैंपस भर्ती (Campus Placement) न के बराबर है। विशेषज्ञों का कहना है कि एनबीए मान्यता हासिल करने के लिए कॉलेजों को एक लंबी और कठिन सुधार प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसके लिए पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति, आधुनिक और हाई-टेक प्रयोगशालाएं, पेटेंट व शोध गतिविधियां जरूरी हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बिहार के अधिकांश सरकारी कॉलेजों में आज भी स्थायी प्रोफेसरों और विभागाध्यक्षों की भारी कमी है और पूरी व्यवस्था केवल अतिथि शिक्षकों (गेस्ट फैकल्टी) के भरोसे जैसे-तैसे घिसट रही है।
वाशिंगटन एकॉर्ड से जुड़ा है एनबीए का असली खेल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमान्य हो सकती है बिहार की डिग्री
आपको बता दें कि भारत वैश्विक स्तर पर 'वाशिंगटन एकॉर्ड' (Washington Accord) का एक आधिकारिक सदस्य देश है। इस समझौते के तहत केवल एनबीए (NBA) से मान्यता प्राप्त इंजीनियरिंग प्रोग्राम और डिग्रियों को ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च मान्यता और स्वीकार्यता मिलती है। ऐसे में बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए एनबीए का सर्टिफिकेट हासिल करना सिर्फ कोई प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर सूबे के लाखों छात्रों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा हुआ एक बेहद गंभीर जीवन-मरण का सवाल बन चुका है। तकनीकी विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि जब तक राज्य सरकार और शिक्षा विभाग इच्छाशक्ति दिखाकर कॉलेजों के बुनियादी ढांचे को मजबूत नहीं करेंगे, तब तक बिहार के छात्र राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा में लगातार पिछड़ते रहेंगे।