पीएम मोदी के 'हनुमान' चिराग पासवान की उत्तर प्रदेश में बड़ी एंट्री

पीएम मोदी के 'हनुमान' चिराग पासवान की उत्तर प्रदेश में बड़ी एंट्री

भारतीय राजनीति के फलक पर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) का सियासी रण हमेशा से देश की सत्ता की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा केंद्र रहा है, और इस वक्त सूबे की राजनीति से एक बेहद सनसनीखेज और रणनीतिक खबर सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद और 'हनुमान' कहे जाने वाले केंद्रीय मंत्री तथा लोक जनशक्ति पार्टी (LJP-RV) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी सक्रिय दखल देने की पूरी तैयारी कर ली है। चिराग पासवान की निगाहें सीधे तौर पर यूपी के उस बहुमूल्य दलित और खासकर गैर-जाटव दलित वोट बैंक पर टिकी हुई हैं, जिसे कभी उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP) का सबसे सुरक्षित और अजेय किला माना जाता था। बिहार की राजनीति में अपनी करिश्माई युवा लीडरशिप और आक्रामक तेवरों से युवाओं और दलित समाज के बीच मजबूत पकड़ बनाने वाले चिराग पासवान का यह कदम आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय समीकरणों और खासकर बीएसपी के राजनीतिक वजूद के लिए एक बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है। जैसे ही इस रणनीतिक विस्तार की सुगबुगाहट शुरू हुई है, वैसे ही राज्य के सियासी गलियारों और विपक्षी दलों के खेमे में गहरी चिंता की लहर दौड़ गई है।

उत्तर प्रदेश में गैर-जाटव दलित वोटों पर एनडीए की पैनी नजर, चिराग पासवान के जरिए बीजेपी चल रही है एक बड़ा और अचूक सियासी दांव

राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के जनाधार में पिछले कुछ वर्षों से लगातार आ रही गिरावट और बिखराव का फायदा उठाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने एक बेहद सुनियोजित रणनीति तैयार की है। इसी रणनीति के तहत दलित समाज के एक बड़े युवा और प्रभावी चेहरे के रूप में चिराग पासवान को आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि वे यूपी के पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में अपनी रैलियों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए गहरी पैث बना सकें जो कभी मायावती के मजबूत गढ़ हुआ करते थे। चिराग पासवान की भाषण शैली, उनके पिता स्व. राम विलास पासवान की राजनीतिक विरासत और उनकी सोशल इंजीनियरिंग की कला दलित वर्ग के युवाओं को अपनी ओर तेजी से आकर्षित कर रही है। एनडीए खेमे का यह सोचना है कि यदि लोकसभा और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले दलित वोटों के एक बड़े हिस्से को एनडीए के पाले में पूरी तरह से एकजुट कर लिया जाए, तो विपक्षी दलों के तमाम समीकरण अपने आप धराशायी हो जाएंगे और उत्तर प्रदेश में भगवा गठबंधन की सियासी ज़मीन और अधिक मजबूत हो जाएगी।

बीएसपी सुप्रीमो मायावती के सामने अस्तित्व बचाने की बड़ी चुनौती, क्या क्षेत्रीय दलों के बीच पिस जाएगी हाथी की सियासी ताकत?

चिराग पासवान के इस आक्रामक उत्तर प्रदेश दौरे और दलित बस्तियों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की तैयारियों ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) की नींद उड़ा दी है। पिछले कुछ चुनावी परिणामों से लगातार कमजोर होती जा रही बीएसपी के सामने अब अपने उस पारंपरिक वोट बैंक को बचाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है, जिसके बल पर मायावती कभी उत्तर प्रदेश की सियासत की 'सुपर-क्वीन' हुआ करती थीं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दलित समाज का एक युवा वर्ग अब पारंपरिक राजनीतिक बंधी-बंधाई परिपाटी से आगे निकलकर विकास, रोजगार और राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर अपनी राजनीतिक वफादारी तय कर रहा है, और चिराग पासवान इसी आधुनिक और महत्वाकांक्षी युवा वर्ग की नब्ज को बहुत अच्छी तरह से पहचानते हैं। यदि चिराग पासवान अपने इस मिशन में कामयाब हो जाते हैं, तो उत्तर प्रदेश में बीएसपी की राजनीतिक जमीन पर एक बहुत बड़ा ग्रहण लग सकता है और राज्य की राजनीति पूरी तरह से दोध्रुवीय यानी बीजेपी और सपा के बीच सिमट कर रह जाएगी। बहरहाल, आगामी महीनों में चिराग पासवान के उत्तर प्रदेश में होने वाले ये दौरे और उनकी जनसभाएं इस बात का फैसला करेंगी कि क्या वाकई यूपी का दलित वोटर अब नए विकल्पों की तलाश में पूरी तरह से तैयार हो चुका है या नहीं।