अकेले दम पर अजनार नदी का कायाकल्प: जानिए कौन हैं 'बिट्टू तबाही' जिनकी मुरीद हुई दुनिया
'मेहनत इतनी खामोशी से करो कि कामयाबी शोर मचा दे...' और 'कौन कहता है आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो...' ये पंक्तियां मध्य प्रदेश के युवा सुरेंद्र सिंह चौधरी उर्फ 'बिट्टू तबाही' के साहसिक कदम पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। गंदगी, कचरे और जलकुंभी से लबालब होकर नाले में तब्दील हो चुकी ऐतिहासिक अजनार नदी को पुनर्जीवित कर इस होनहार युवा ने देश-दुनिया के सामने एक ऐसी अनूठी मिसाल कायम की है, जिसकी गूंज सोशल मीडिया से लेकर सत्ता और उद्योग जगत के गलियारों तक सुनाई दे रही है। नदी को उसके पुराने और स्वच्छ स्वरूप में लौटते देख आसपास के ग्रामीणों की आंखों में खुशी के आंसू हैं।
आनंद महिंद्रा से लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव तक हुए मुरीद
बिट्टू के इस अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प की चर्चा अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हो रही है। देश के दिग्गज उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने सोशल मीडिया पर उनके प्रयास की मुक्तकंठ से सराहना की है, वहीं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी इस युवा के जज्बे को सलाम करते हुए उनकी पीठ थपथपाई है। यहां तक कि बिट्टू की इस लगन को देखकर उन्हें विदेशों से भी आकर्षक जॉब ऑफर मिल रहे हैं, लेकिन उनका दिल अपनी मिट्टी और पर्यावरण की सेवा में ही रमता है।
दोस्तों ने छोड़ा साथ, तंगी के बावजूद खुद किराए पर ली जेसीबी
यह सफर फूलों की सेज नहीं बल्कि कांटों भरा था। जब बीएससी द्वितीय वर्ष के छात्र सुरेंद्र ने अजनार नदी को साफ करने का बीड़ा उठाया, तो शुरुआत में साथ देने का वादा करने वाले दोस्त धीरे-धीरे पीछे हट गए। बेहद साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद बिट्टू के कदम नहीं डगमगाए। नदी की तलहटी में वर्षों से जमा भारी कचरा और सिल्ट निकालने के लिए उन्होंने अपनी जेब से पैसों की व्यवस्था की और खुद के खर्च पर जेसीबी मशीन किराए पर बुलाई। पहाड़ जैसी विशाल चुनौती के सामने उन्होंने अपने फौलादी इरादों से साबित कर दिया कि नेक नीयत से की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।
सिस्टम को आईना और आधुनिक 'दशरथ मांझी' का अक्स
बिट्टू का यह कारनामा बिहार के उस 'माउंटेन मैन' दशरथ मांझी की याद दिलाता है, जिन्होंने अकेले दम पर पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बना दिया था। इसके साथ ही, यह मुहिम सरकारी सिस्टम और नगर पालिका तंत्र की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। जो काम करोड़ों के बजट और सरकारी मशीनरी से होना चाहिए था, उसे एक आम छात्र को अपने दम पर अंजाम देना पड़ा। यह प्रयास उन तमाम संस्थाओं और विभागों को आईना दिखाता है जो सिर्फ कागजों और फाइलों में करोड़ों खर्च कर नदियां साफ करने के बड़े-बड़े दावे करते हैं।
यमुना से हिंडन तक बेहाल, जनभागीदारी ही एकमात्र विकल्प
आज स्थिति सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में प्राचीन हिंडन से लेकर यमुना तक कई नदियां अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। अनियंत्रित शहरीकरण, फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल, सीवेज का गिरता पानी और अतिक्रमण के कारण कुएं, पोखर व तालाब लुप्त होने की कगार पर हैं और जलीय जीवों का जीवन संकट में है। बिट्टू तबाही की यह स्वर्णिम पहल यह साफ संदेश देती है कि केवल सरकारों और खोखले वादों के भरोसे पर्यावरण की रक्षा नहीं हो सकती। नदियों को अविरल और निर्मल बनाने के लिए हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझनी होगी और आगे आना होगा।