चीन में सोने की ताबड़तोड़ खरीद से चमकी दुनिया की चमक, रिकॉर्ड तोड़ रहा गोल्ड इंपोर्ट
वैश्विक आर्थिक बाजार, कमोडिटी एक्सचेंज और बहुमूल्य धातुओं की दुनिया में इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला विरोधाभास देखने को मिल रहा है, जो पूरी दुनिया के वित्तीय विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। एक तरफ जहां भारत सरकार और केंद्रीय बैंक लगातार देश के आम नागरिकों से सोने की बढ़ती खरीदारी पर लगाम लगाने और अपनी गाढ़ी कमाई को अनुत्पादक परिसंपत्तियों के बजाय वित्तीय बाजारों या बचत योजनाओं में निवेश करने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी महाशक्ति चीन में सोने के आयात (Gold Import) ने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। चीनी नागरिक और वहां के केंद्रीय बैंक दोनों ही जिस बेताबी से सोने का भारी-भरकम जखीरा अपने देश में इकट्ठा कर रहे हैं, उसने ग्लोबल मार्केट में बुलियन के दामों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। आइए इस विशेष आर्थिक और भू-राजनीतिक रिपोर्ट में गहराई से जानते हैं कि भारत की समझाइश और चीन के इस बेकाबू होते सोने के पागलपन के पीछे की असली इनसाइड स्टोरी क्या है।
भारत में क्यों हो रही है सोना न खरीदने की अपील और क्या हैं इसके पीछे के आर्थिक मायने?
भारतीय संस्कृति और परंपरा में सोने के प्रति लगाव सदियों पुराना रहा है, जहां हर शुभ अवसर, शादी-ब्याह और त्योहारों पर सोना खरीदना शान और सुरक्षा की निशानी माना जाता है। हालांकि, भारत सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) अक्सर यह चिंता जताते आए हैं कि सोने के आयात पर भारी-भरकम विदेशी मुद्रा खर्च होती है, जिससे देश के चालू खाते के घाटे (CAD) पर सीधा असर पड़ता है। इसके अलावा, जब वैश्विक स्तर पर सोने के दाम आसमान छू रहे होते हैं, तब आम जनता द्वारा सोने में पैसा फंसाना देश की उत्पादक अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद नहीं माना जाता है। सरकार और वित्तीय विशेषज्ञ लगातार यह समझाते रहे हैं कि नागरिकों को भौतिक सोने के बजाय सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड, म्यूचुअल फंड्स या अन्य सरकारी बचत योजनाओं में निवेश करना चाहिए ताकि देश की आर्थिक सेहत मजबूत बनी रहे और व्यक्तिगत निवेश पर भी बेहतर रिटर्न प्राप्त हो सके।
चीन में सोने का रिकॉर्ड तोड़ आयात: ड्रैगन क्यों झोंक रहा है अपनी ताकत बहुमूल्य धातुओं में?
भारतीय परिदृश्य के बिल्कुल विपरीत, चीन के भीतर सोने की मांग इस समय अपने चरम पर है और वहां का सोने का आयात ऐतिहासिक आंकड़ों को पार कर चुका है। चीन के आम लोग, निवेशक और वहां का केंद्रीय बैंक 'पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना' पिछले कई महीनों से लगातार बड़े पैमाने पर सोने की ताबड़तोड़ खरीदारी कर रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि चीन अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है और अपनी अर्थव्यवस्था को भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षित निवेश (Safe Haven) के रूप में सोने का विशाल भंडार तैयार कर रहा है। इसके अलावा, चीनी घरेलू बाजार में रियल एस्टेट सेक्टर की मंदी और शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगाया है, जिसके चलते वे अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए एकमात्र भरोसेमंद जरिया यानी सोने की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
ग्लोबल बुलियन मार्केट और अंतरराष्ट्रीय सोने की कीमतों पर पड़ रहा है इसका भारी असर
जब दुनिया के दो सबसे बड़े उपभोक्ता देश यानी भारत और चीन इस तरह के विपरीत रुख अपनाते हैं, तो उसका सीधा असर वैश्विक सोने की कीमतों पर पड़ना तय माना जाता है। चीन द्वारा की जा रही इस ताबड़तोड़ और रिकॉर्ड खरीदारी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है, जिससे बुलियन मार्केट में कीमतें लगातार ऊपर की ओर बनी हुई हैं। एक तरफ जहां भारतीय खरीदार ऊंचे दामों के कारण थोड़ा संभलकर चल रहे हैं और सरकार की अपील का भी असर दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ चीनी बाजार की भारी डिमांड ने वैश्विक कीमतों को गिरने नहीं दिया है। कमोडिटी मार्केट के जानकारों का यह मानना है कि जब तक चीन का केंद्रीय बैंक और वहां के निवेशक इसी तरह सोने की तिजोरियां भरते रहेंगे, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की चमक फीकी पड़ने की कोई संभावना नजर नहीं आती है।
आम निवेशकों के लिए क्या है सबक और भविष्य में कैसी रहेगी सोने की चाल?
गोल्ड मार्केट के इस मौजूदा दौर को देखते हुए निवेशकों और आम नागरिकों के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि उन्हें इस स्थिति में क्या करना चाहिए। वित्तीय जानकारों की सलाह हमेशा यही रहती है कि सोने को केवल एक आभूषण या तात्कालिक शौक के रूप में देखने के बजाय अपने कुल निवेश पोर्टफोलियो का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा ही सुरक्षित और लॉन्ग-टेन्योर एसेट के रूप में रखना चाहिए। भारत सरकार की अपील का उद्देश्य भी यही है कि देश का पैसा अनुत्पादक रूप से तिजोरी में बंद न रहकर देश के विकास में योगदान दे। चीन की आक्रामक खरीद और वैश्विक बाजार के रुख को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले दिनों में सोने की कीमतें भू-राजनीतिक उथल-पुथल और केंद्रीय बैंकों की नीतियों से तय होती रहेंगी, इसलिए किसी भी प्रकार के निवेश से पहले बाजार की चाल को भली-भांति समझ लेना ही समझदारी होगी।