यूपीआई : विपक्षी सांसदों ने इसे बताया देश की जनता के साथ भयंकर धोखा और सरासर जनविरोधी कदम
भारतीय डिजिटल इकोनॉमी (Digital Economy) और फिनटेक सेक्टर की रीढ़ बन चुके यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (Unified Payments Interface) को लेकर इन दिनों देश के राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। आम आदमी से लेकर छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों तक की हर रोज की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बन चुके डिजिटल लेनदेन पर संभावित फीस या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की खबरों ने देश भर में हलचल मचा दी है। इस गंभीर मुद्दे पर संसद से लेकर सड़क तक तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आनी शुरू हो गई हैं, और देश के प्रमुख विपक्षी सांसदों ने इस संभावित फैसले को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे एक बेहद 'जनविरोधी' और गरीब-मध्यम वर्ग विरोधी कदम करार दिया है। विपक्षी नेताओं का यह साफ तौर पर कहना है कि जिस डिजिटल क्रांति को पूरी दुनिया में भारत की सबसे बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित किया जाता है, यदि उस पर किसी भी प्रकार का शुल्क या टैक्स लादा गया, तो यह देश के करोड़ों ईमानदार नागरिकों की जेब पर सीधा और बहुत बड़ा डाका होगा। आइए इस पूरी गरमागरम बहस, राजनीतिक घमासान और डिजिटल ट्रांजैक्शन से जुड़े हर एक पहलू को गहराई से समझते हैं।
क्या है पूरा मामला और क्यों अचानक यूपीआई ट्रांजैक्शन पर फीस लगने की सुगबुगाहट से मचा है कोहराम?
बीते कुछ समय से वित्तीय संस्थानों, बैंकों और फिनटेक कंपनियों के बीच इस बात को लेकर लगातार उच्च स्तरीय मंथन चल रहा है कि जीरो-एमडीआर (Zero-MDR) मॉडल के कारण डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का रख-रखाव करने वाले बैंकों और पेमेंट गेटवे को भारी वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है। इस घाटे की भरपाई के लिए और बैंकों के कामकाज को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए यह प्रस्ताव दिया गया था कि कुछ चुनिंदा बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन्स या रूपे क्रेडिट कार्ड आधारित यूपीआई भुगतानों पर एक न्यूनतम शुल्क (Fee or Charges) लगाया जा सकता है। जैसे ही यह खबर मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर आई, वैसे ही आम उपभोक्ताओं और व्यापारियों के बीच चिंता की लहर दौड़ गई। भारत में यूपीआई की सबसे बड़ी खूबी यही रही है कि चाहे आप एक चाय की टपरी पर 10 रुपये का भुगतान करें या मॉल में 10 हजार रुपये का, ग्राहक और दुकानदार दोनों के लिए यह सेवा पूरी तरह से मुफ्त और झंझट-मुक्त थी।
विपक्षी सांसदों का सरकार पर तीखा प्रहार: 'यह डिजिटल इंडिया की सफलता के बिल्कुल विपरीत है'
संसद के भीतर और बाहर विपक्षी दलों के वरिष्ठ सांसदों ने इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि सरकार एक तरफ तो देश में 'कैशलेस इकॉनमी' और 'डिजिटल इंडिया' का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन दूसरी तरफ ऐसे नीतिगत फैसले लेने की तैयारी कर रही है जो आम जनता को वापस नगदी की तरफ धकेल देंगे। सांसदों ने यह चेतावनी दी है कि यदि यूपीआई लेनदेन पर किसी भी प्रकार का शुल्क लगाया जाता है, तो देश के छोटे दुकानदार और व्यापारी, जो अब तक डिजिटल पेमेंट को खुशी-खुशी अपना रहे थे, वे फिर से कैश लेने के लिए मजबूर हो जाएंगे क्योंकि हर ट्रांजैक्शन पर कटने वाला कमीशन उनके छोटे मुनाफे को निगल जाएगा। विपक्ष ने इस कदम को पूरी तरह से जनविरोधी बताते हुए मांग की है कि सरकार को तुरंत स्पष्टीकरण देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आम जनता के लिए यूपीआई हमेशा की तरह पूरी तरह मुफ्त बना रहे।
डिजिटल पेमेंट क्रांति और इकोनॉमी पर इसका क्या होगा दूरगामी असर?
वित्तीय विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों का यह मानना है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में जो फिनटेक बूम देखा गया है, उसकी सबसे बड़ी वजह यूपीआई का शून्य लागत (Zero Cost) मॉडल ही रहा है। ग्रामीण इलाकों से लेकर महानगरों तक जिस तेजी से रिक्शेवाले, सब्जी विक्रेता और आम नागरिकों ने गूगल पे, फोनपे और पेटीएम जैसे प्लेटफॉर्म्स को अपनाया है, उसने देश की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता लाने का काम किया है। यदि इस पर शुल्क लगाया जाता है, तो लेनदेन की कुल संख्या में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे डिजिटल साक्षरता और वित्तीय समावेशन के सरकारी सपनों को भी तगड़ा झटका लग सकता है। यही कारण है कि केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि आम उपभोक्ता भी इस संभावित फैसले के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपनी कड़ी नाराजगी दर्ज करा रहे हैं।
सरकार का रुख और भविष्य की उम्मीदें: क्या सच में आम आदमी की जेब पर पड़ेगा असर?
हालांकि विपक्षी दलों के तीखे हमलों और जनता के आक्रोश के बाद वित्तीय मामलों से जुड़े मंत्रालयों और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) की तरफ से अभी तक कोई भी अंतिम आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है, लेकिन इस सुगबुगाहट ने यह जरूर साबित कर दिया है कि देश की जनता अब डिजिटल सेवाओं में मिलने वाली सहूलियत के साथ कोई भी समझौता करने के मूड में नहीं है। सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे बैंकों और पेमेंट ऑपरेटर्स के वित्तीय हितों की रक्षा कैसे करें और साथ ही आम जनता पर बिना किसी अतिरिक्त बोझ को डाले डिजिटल भुगतान की इस लोकप्रिय संस्कृति को कैसे निर्बाध रूप से आगे बढ़ाएं। आने वाले दिनों में संसद के सत्र और वित्तीय समितियों की बैठकों में इस मुद्दे पर और अधिक हंगामा देखने को मिल सकता है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।