BMS रेटिंग गायब होने का मुद्दा उठाने पर यूजर ने किया कानूनी नोटिस मिलने का दावा!

BMS रेटिंग गायब होने का मुद्दा उठाने पर यूजर ने किया कानूनी नोटिस मिलने का दावा!

भारतीय सिनेमा जगत में जब भी किसी बड़े स्टार की मेगा बजट फिल्म रिलीज होने वाली होती है, तो उसके प्रमोशन से लेकर बॉक्स ऑफिस तक की हर एक हलचल पर करोड़ों फैंस की नजरें टिकी रहती हैं। इन दिनों साउथ सिनेमा के सुपरस्टार यश की आने वाली बेहद प्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक’ (Toxic) लगातार सुर्खियों में बनी हुई है, लेकिन इस बार यह फिल्म अपनी किसी टीजर या गाने के कारण नहीं बल्कि एक बेहद अजीबोगरीब और गंभीर विवाद के कारण इंटरनेट का तापमान हाई किए हुए है। मामला तब गरमाया जब सोशल मीडिया पर एक फिल्म समीक्षक और एक्टिव यूजर ने यह बड़ा दावा किया कि लोकप्रिय टिकटिंग प्लेटफॉर्म बुकमीशो यानी BMS से इस फिल्म से जुड़े कुछ आंकड़े या रेटिंग्स अचानक गायब होने का मुद्दा उठाने के बाद उन्हें सीधे तौर पर कानूनी नोटिस थमा दिया गया है। जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर फैली, वैसे ही फिल्मी गलियारों से लेकर डिजिटल स्पेस तक हलचल तेज हो गई और लोग यह सोचने पर मजबूर हो गए कि क्या आज के समय में किसी फिल्म की ऑनलाइन विजिबिलिटी या रेटिंग पर सवाल उठाना भी इतना बड़ा जुर्म बन गया है कि सीधे कानूनी शिकंजा कस दिया जाए। इस सनसनीखेज दावे ने मनोरंजन उद्योग में एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या डिजिटल सेंसरशिप और कॉर्पोरेट दबाव आम क्रिटिक्स और जनता की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने का काम कर रहे हैं।

क्या था पूरा बुकमीशो रेटिंग विवाद और क्यों एक साधारण यूजर को झेलना पड़ा कानूनी कार्रवाई का सामना?

इस पूरे विवाद की जड़ें उस डिजिटल बहस में छिपी हैं जो पिछले कुछ दिनों से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर चल रही थी। जब ‘टॉक्सिक’ फिल्म के मेकर्स और फैंस के बीच उत्साह अपने चरम पर था, तब कुछ सोशल मीडिया यूजर्स और ट्रैकर्स ने यह नोटिस किया कि टिकटिंग प्लेटफॉर्म्स पर इस फिल्म से जुड़ी कुछ खास यूजर रेटिंग्स या विवरण अचानक से नजर नहीं आ रहे हैं। इस तकनीकी या प्रबंधकीय बदलाव को पॉइंट आउट करते हुए एक सोशल मीडिया यूजर ने अपने अकाउंट पर एक पोस्ट साझा किया, जिसमें उन्होंने यह सवाल उठाया कि आखिर इस तरह से रेटिंग्स और आंकड़ों को प्लेटफॉर्म से हटाने के पीछे क्या वजह हो सकती है। यूजर का यह सोचना था कि यह एक आम सिनेमा प्रेमी या एनालिस्ट की तरह किया गया सवाल है, लेकिन मामला तब पूरी तरह पलट गया जब उस यूजर के अनुसार उन्हें फिल्म से जुड़े पक्ष या संबंधित अधिकारियों की तरफ से एक आधिकारिक कानूनी नोटिस भेज दिया गया। इस नोटिस में यह आरोप लगाया गया कि उनकी ओर से फैलाई गई बातें या उठाए गए सवाल भ्रामक हैं और इससे फिल्म की ब्रांड वैल्यू तथा बॉक्स ऑफिस की संभावनाओं को नुकसान पहुंच रहा है। एक छोटे से सोशल मीडिया पोस्ट के बाद इस तरह की भारी-भरकम कानूनी कार्रवाई की खबर सामने आने के बाद से डिजिटल स्पेस में काम करने वाले तमाम क्रिएटर्स और स्वतंत्र समीक्षक अब सहम गए हैं और वे यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या सोशल मीडिया पर अपनी राय रखना भी अब अपराध की श्रेणी में आने लगा है।

स्वतंत्र समीक्षा और डिजिटल फ्रीडम पर मंडराता खतरा, फिल्म इंडस्ट्री और फैंस के बीच छिड़ी जंग

इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद से इंटरनेट पर दो स्पष्ट धड़े बन चुके हैं। एक तरफ जहां फिल्म के मेकर्स और सुपरस्टार यश के कट्टर फैंस का यह मानना है कि किसी भी फिल्म के रिलीज होने से पहले या उसके प्रमोशन के दौरान इस तरह की नकारात्मक अफवाहें फैलाना या टिकटिंग प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करना पूरी तरह से गलत है, क्योंकि इससे फिल्म के निर्माण में लगे करोड़ों रुपये और कलाकारों की मेहनत प्रभावित होती है। वहीं दूसरी तरफ, सोशल मीडिया यूजर्स, डिजिटल राइट्स एक्टिविस्ट्स और स्वतंत्र क्रिटिक्स का यह कहना है कि एक नागरिक और दर्शक के रूप में किसी भी प्लेटफॉर्म पर दिखने वाली अनियमितताओं पर सवाल उठाना हर किसी का लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि कोई यूजर केवल यह जानना चाहता है कि किसी फिल्म की रेटिंग या डेटा अचानक क्यों गायब हो गया, तो इसे कानूनी नोटिस देकर चुप कराने की कोशिश करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) पर सीधा हमला माना जाना चाहिए। इस तरह के मामलों ने यह साबित कर दिया है कि आज के आधुनिक सिनेमाई युग में पीआर (PR) और लीगल टीमें कितनी ज्यादा सतर्क हो चुकी हैं और वे किसी भी प्रकार की छोटी से छोटी नकारात्मक चर्चा को भी शुरुआती दौर में ही कुचल देना चाहती हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यह कानूनी विवाद यहीं थमता है या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और स्वतंत्र विचारकों के बीच यह लड़ाई आने वाले समय में अदूर तक और आगे जाती है।