Up kiran,Digital Desk : भाजपा के नव निर्वाचित अध्यक्ष नितिन नवीन ने औपचारिक रूप से जिम्मेदारी संभाल ली है। पदभार ग्रहण से पहले उन्होंने पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं का आशीर्वाद लिया, लेकिन इसके बावजूद अंदरखाने असहजता खत्म नहीं हुई है। पार्टी के एक गुट को नितिन नवीन का अध्यक्ष बनना रास नहीं आ रहा। उम्र और अनुभव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। यहां तक कि एक वरिष्ठ नेता तो चर्चा के दौरान इतना खफा हो गए कि कह बैठे—नितिन नवीन क्या कर लेंगे? इसी बीच भाजपा के भीतर यह भी चर्चा है कि नितिन नवीन के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अध्यक्ष पद को लेकर लंबे समय से चल रहे सियासी संकट को बड़ी चतुराई से टाल दिया। हालांकि, दूसरा गुट अभी भी अपनी उम्मीदें छोड़े बिना मौके की तलाश में है।
अंतरिम बजट में ममता बनर्जी का सियासी दांव
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 2 फरवरी को राज्य का अंतरिम बजट पेश करेंगी। चुनावी माहौल को देखते हुए इस बजट पर उनकी खास नजर है। माना जा रहा है कि ममता इस बार युवाओं को साधने की कोशिश करेंगी। हालांकि भाजपा की अग्निमित्रा पॉल का कहना है कि ममता अब चाहे जितने दांव खेल लें, इस बार वह बंगाल का मिजाज पढ़ने में चूक गई हैं। इसके साथ ही ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के अन्य नेताओं को अहम जिम्मेदारियां सौंपी हैं और साफ निर्देश दिए हैं कि बयानबाजी में संयम बरता जाए और सोच-समझकर बोला जाए।
जदयू में शीत युद्ध, पर अंदाज बिल्कुल अलग
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही जदयू के सर्वोच्च नेता हैं, लेकिन इन दिनों वह अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहे हैं। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह राजनीति के दांव-पेच में माहिर माने जाते हैं। पार्टी के भीतर कुछ नेता हाशिए पर चले गए हैं और मुख्यधारा में लौटने को बेचैन हैं। इस बेचैनी की एक वजह आगामी राज्यसभा चुनाव भी है। इसी बीच जदयू में कई स्तरों पर शीत युद्ध चल रहा है। आरसीपी सिंह पार्टी में वापसी को लेकर उत्सुक बताए जा रहे हैं, जबकि श्याम रजक के बयान—कि आरसीपी पार्टी से गए ही कब थे—ने नई उलझन खड़ी कर दी है। दिल्ली में ललन सिंह की टीम केसी त्यागी का पत्ता काटने की कोशिश में भी जुटी है। वहीं, नीतीश कुमार अपनी पुरानी शैली में बिना बोले धीरे-धीरे चाल चल रहे हैं और सभी सियासी धड़े समय की नब्ज टटोलने में लगे हैं।
असम में हिमंता का बड़ा दावा, पर भीतरखाने चेतावनी भी
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने केंद्रीय भाजपा नेतृत्व को भरोसा दिलाया है कि राज्य में पार्टी 80 से अधिक सीटें जीतेगी। दूसरी ओर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और भंवर जितेंद्र सिंह की टीम भी बड़े दावे कर रही है। कांग्रेस सांसद गौरव गगोई को कोच-राजबोंगशी, ताई-अहोम, चुटिया, मटक, मोरान और चाय जनजातियों की नाराजगी से उम्मीदें बंधी हैं। तृणमूल कांग्रेस की एक राज्यसभा सांसद का कहना है कि सीएए-एनआरसी को लेकर जनता के बड़े वर्ग में असंतोष है। इन सबके बीच भाजपा के ही एक नेता ने पार्टी रणनीतिकारों को चौंकाते हुए कहा कि हिमंता बिस्वा सरमा जितने मजबूत नेता हैं, उतने ही बड़े शो-मैन भी हैं। ऐसे में जरा सी चूक भारी पड़ सकती है।




