सावन के लोक गीत : प्रकृति के अनुपम सौंदर्य में लगा देते हैं चार चांद

चहुंओर फैली हरियाली, बारिश की फुहारें, नीम के पेड़ पर पड़े झूले पर कजरी गीत जाती महिलायें और आल्हा के स्वर सावन माह की पहचान है। लोक गीत सावन की रिमझिम बारिश और प्रकृति की अपार सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। सावन में गीत के साथ संगीत की भी खास परंपरा है। ढोलक की थाप पर सुरीले लोकगीतों की स्वर लहरियां जब कानों में पड़ती हैं तो सावन का आनंद और बढ़ जाता है। कजरी गीत को तो सावन का श्रृंगार ही कहा जाता है।

 

सखियाँ हाथों में मेंहदी रचाकर झूला झूलते हुए गीत गाती हैं, तो प्रकृति भी नए रंग में नजर आने लगती है। सावन माह में अवध क्षेत्र में विशेष रूप से कजरी गाने का विशेष महत्व है। इन कजरी गीतों में सास ननद के ताने, पिया से रूठना, सखियों से हास-परिहास आदि शामिल होता है। कजरी गीत कइसे खेलन जाइबू सावन मा कजरिया … बदरिया घेरे आवै ननदी में भौजाई नंनद की नोंक-झोक नजर आती है। यह परंपरा आज भी कायम है।

सावन में कजरी गीतों के अलावा रोपनी गीत, झूला गीत, मल्हार, मेंहदी, चौमासा और हिंडोला गीत भी गाए जाते हैं। इस गीतों में मेंहदी गीत गोरी के गोरे-गोरे हाथ मेंहदी खूब रची, मल्हार गीत झमक के बरसो कारी बदरिया, राम गीत लक्ष्मण कहां जानकी हुइए आइसी विकट अधेरिया ना लोक समाज में आज भी खूब गाये जाते हैं।

इसी तरह पारम्परिक कजरी ‘अरे रामा भीजत मोर चुनरिया … बदरिया … बरसे रे हारी, चूड़ी गीत ‘लेके आया मोरा बालमा हरियाली चूड़ियां, मनिहारी गीत ‘चुड़ी वाले चुड़ी पहिना दे … बहियां सजा दे, झूला गीत ‘नन्हीं-नन्हीं बुंदिया रे सावन का मोरा झूलना, मेंहदी गीत ‘रुचि रुचि पीसे मेंहदिया, मयूर नृत्य गीत ‘गरजि रहे बदरा चारिऊ ओरिया, रक्षाबन्धन गीत ‘तोहरी नेहिया पर बलि बलि जाईं बिरना समेत कई गीत विशेष रूप से गाए हुए सुने जाते हैं।

इस तरह सावन की भीनीं-भीनीं बूंदें लोक गीतों को प्रेम रस से भिगोती हैं। ये लोह गीत प्रेमी जोड़ों की आंखों में प्रतीक्षा की आहटों में नहाते प्रतीत होते हैं। रंग- बिरंगे पंछियों की चंचल अदाएं और नीम की निमौरियां लोक गीतों को प्रेम में पिरो देती हैं। सखियां एक दूसरी से हंसी ठिठोली करती हैं। सावन के गीतों में ये सब सजीव हो उठता है।

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