युवा क्यों धड़ल्ले से करा रहे हैं 'कोर्टिसोल' का टेस्ट? जानिए डॉक्टर ने क्यों कहा ....

युवा क्यों धड़ल्ले से करा रहे हैं 'कोर्टिसोल' का टेस्ट? जानिए डॉक्टर ने क्यों कहा ....

आजकल की इस भागदौड़ भरी जिंदगी, सोशल मीडिया के प्रेशर और कॉर्पोरेट जगत के तनावपूर्ण माहौल के बीच युवाओं के बीच एक नया ही ट्रेंड तेजी से पैर पसार रहा है, जिसे देखकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी हैरान और थोड़े चिंतित हैं। आधुनिक युवा अपनी फिटनेस और स्वास्थ्य को लेकर इतने जागरूक हो चुके हैं कि वे इंस्टाग्राम या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल होने वाले हेल्थ ट्रेंड्स के पीछे अंधे होकर भागने लगे हैं, और इन दिनों उनमें 'कोर्टिसोल टेस्ट' (Cortisol Test) कराने की एक अजीब सी होड़ मची हुई है। लोगों को लगता है कि उनके शरीर में होने वाली हर छोटी-मोटी थकान, वजन का बढ़ना या मूड स्विंग होने की एकमात्र वजह 'स्ट्रेस हार्मोन' यानी कोर्टिसोल का असंतुलन है, जिसके चलते वे डॉक्टर की सलाह के बिना ही लैब्स में जाकर इस टेस्ट के लिए पैसे बहा रहे हैं। लेकिन इस पूरे मामले पर देश के जाने-माने चिकित्सकों और एंडोक्राइनोलॉजिस्ट ने दो टूक शब्दों में यह चेतावनी दी है कि हर किसी को हर वक्त कोर्टिसोल टेस्ट कराने की कोई जरूरत नहीं होती है, क्योंकि यह हॉर्मोन शरीर में प्राकृतिक रूप से घटता-बढ़ता रहता है और इसके हर मामूली बदलाव को बीमारी मान लेना बहुत बड़ी गलतफहमी है।

क्या होता है कोर्टिसोल और शरीर के लिए क्यों जरूरी है यह 'स्ट्रेस हार्मोन'?

वैज्ञानिक और चिकित्सा भाषा में कोर्टिसोल (Cortisol) को मुख्य रूप से शरीर का 'स्ट्रेस हार्मोन' कहा जाता है, जिसका उत्पादन हमारी एड्रेनल ग्रंथियों (Adrenal Glands) द्वारा किया जाता है। जब भी इंसान किसी मानसिक या शारीरिक तनाव, खतरे या मुश्किल परिस्थिति का सामना करता है, तो शरीर को उससे निपटने के लिए ऊर्जा देने का काम यही कोर्टिसोल हार्मोन करता है। इसके अलावा, यह शरीर में ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने, चयापचय यानी मेटाबॉलिज्म को सुचारू चलाने, ब्लड शुगर के स्तर को बनाए रखने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को संतुलित रखने में भी बहुत ही अहम भूमिका निभाता है। यानी कुल मिलाकर कहें तो कोर्टिसोल हमारे जीवन के लिए एक बेहद जरूरी हार्मोन है, और यदि यह शरीर में पूरी तरह से खत्म हो जाए तो इंसान जीवित भी नहीं रह सकता। समस्या तब पैदा होती है जब यह हार्मोन लंबे समय तक लगातार बहुत ज्यादा या बहुत कम मात्रा में बनने लगता है, जिसे चिकित्सीय भाषा में गंभीर बीमारियां कहा जाता है, न कि हर आम थकान को कोर्टिसोल बढ़ना मान लिया जाता है।

सोशल मीडिया का वायरल ट्रेंड और युवाओं में कोर्टिसोल को लेकर फैली भ्रांतियां

आजकल इंस्टाग्राम रील्स और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 'कोर्टिसोल फेस' (Cortisol Face) या 'हाई कोर्टिसोल सिम्पटम्स' नाम से हजारों ऐसे वीडियो धड़ल्ले से वायरल हो रहे हैं, जिनमें यह दावा किया जाता है कि चेहरे पर सूजन या सुबह उठने पर सुस्ती का कारण सिर्फ बढ़ा हुआ कोर्टिसोल है। इन भ्रामक और आधे-अधूरे ज्ञान वाले वीडियो को देखकर आज की युवा पीढ़ी बिना किसी मेडिकल बैकग्राउंड के यह मान बैठती है कि वे क्रोनिक स्ट्रेस का शिकार हो चुके हैं और उन्हें तुरंत अपना कोर्टिसोल टेस्ट कराना चाहिए। डॉक्टर बताते हैं कि कोर्टिसोल का स्तर पूरे दिन में एक जैसा नहीं रहता है, बल्कि यह हमारे सर्कैडियन रिदम (Circadian Rhythm) यानी बायोलॉजिकल क्लॉक के हिसाब से सुबह के वक्त सबसे ज्यादा होता है और रात में सोते समय सबसे कम हो जाता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति बिना किसी तय डॉक्टर के प्रोटोकॉल के किसी भी समय जाकर अपना ब्लड या सैलिव्हा टेस्ट करा लेता है, तो उसकी रिपोर्ट गलत आ सकती है या वह सामान्य उतार-चढ़ाव को भी बीमारी समझकर घबराने लगता है।

आखिर किन विशेष परिस्थितियों में होती है असली कोर्टिसोल टेस्ट की जरूरत?

चिकित्सा विज्ञान यह स्पष्ट करता है कि कोर्टिसोल का स्तर मापने के लिए किए जाने वाले टेस्ट (जैसे कि 24-घंटे का मूत्र परीक्षण, सीरम कोर्टिसोल या डेक्सामेथासोन सप्रेशन टेस्ट) केवल तभी डॉक्टर द्वारा लिखे जाते हैं जब मरीज के शरीर में कुशिंग सिंड्रोम (Cushing's Syndrome) या एडिसन डिजीज (Addison's Disease) जैसे दुर्लभ और गंभीर विकारों के स्पष्ट चिकित्सीय लक्षण दिखाई दे रहे हों। इन गंभीर बीमारियों में मरीज का वजन तेजी से असामान्य रूप से बढ़ने लगता है, मांसपेशियों में अत्यधिक कमजोरी आ जाती है, चेहरे पर सूजन आने लगती है, और ब्लड प्रेशर तथा शुगर लेवल पूरी तरह से अनियंत्रित हो जाता है। यदि किसी सामान्य युवा को केवल नौकरी का तनाव, रात में ठीक से नींद न आना या काम के दौरान थकान महसूस हो रही है, तो इसका इलाज कोई ब्लड टेस्ट नहीं बल्कि अपनी जीवनशैली में सुधार करना, समय पर सोना, पौष्टिक आहार लेना और योग या मेडिटेशन करना है। डॉक्टरों का साफ कहना है कि सोशल मीडिया के डर से अपनी सेहत की अनावश्यक जांचें करवाकर मानसिक तनाव और आर्थिक बर्बादी दोनों को न्योता न दें।