जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास एवं स्वरूप

भगवान जगन्नाथ रथयात्रा को लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका पुरी के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी। भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन सुभद्रा की इच्‍छा पूर्ति के लिए उन्‍हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था। वह शुभ दिन आषाढ़ शुक्ल द्वितीया थी। इसके बाद से ही इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी।

एक अन्‍य कथा के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्मदिन होता है। उस दिन प्रभु जगन्नाथ को बड़े भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा के साथ रत्न सिंहासन से उतार कर मंदिर के पास बने स्नान मंडप में ले जाकर उन्हें 108 कलशों से राजसी स्नान करवाया गया। इससे भगवान अस्वस्थ हो गए। इसके बाद भगवान 15 दिन तक एकांत में रहे।

इस दौरान प्रभु को केवल उनके प्रमुख सेवकों और वैद्य ही देख सकते थे। 15 दिन बाद स्वस्थ होने पर भगवान ने भक्‍तों को दर्शन दिया। इसके बाद द्वितीया के दिन महाप्रभु श्री कृष्ण के बड़े भ्राता बलराम तथा बहन सुभद्रा के साथ रथ में बैठकर नगर भ्रमण को निकले थे।

जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान रथ पर विराजमान भगवान जगन्‍नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों के पीछे भी एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। राजा इन्द्रद्युम्न सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे। एक दिन राजा को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा।

राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। विश्वकर्मा जी ने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया।

राजा के परिजनों को ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिये वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा। अब तक वह जीवित भी होगा या नहीं। महारानी के अनुनय पर महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला, लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहां पर मिली।

इस पर महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। उसी क्षण आकाशवाणी हुई कि व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं। अतः महाराजा ने मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर वहीँ पर स्थापित करवा दी। आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मन्दिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं।

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